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राजा भैया: राज के चक्‍कर में 'कुंडा का राजकुमार', क्‍या 2019 में होगा असरदार

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2019 के शोर के बीच एक बिगुल उत्‍तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी बजा. जगह थी रमाबाई आंबेडकर मैदान जहां लाखों की भीड़ के बीच एक राजा ने अपने ही अंदाज़ में एंट्री मारी. इस एंट्री के साथ ही रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने ऐलान कर दिया कि अब यूपी की सियासत में उनकी पार्टी ने भी अपनी दावेदारी पेश कर दी है. निगाहें उठीं और सवाल भी कि आखिर 25 सालों से राजनीति में सक्रिय रहने वाले राजा भैया को अपनी पार्टी बनाने की क्या ज़रूरत पड़ी. कुंडा से विधायक राजा भैया कि वो कौन सी महत्वकांक्षाएं हैं जिन्हें वो पार्टी बनाकर पूरी करना चाहते हैं.

मंच पर एक तरफ राजा भैया थे तो दूसरी तरफ लाखों लोगों की भीड़ और भीड़ से उठ रहा था एक शोर जो नारा बन गया. राजनीति में 25 बरस पूरे करने वाले राजा भैया ने रमाबाई मैदान से न सिर्फ अपी ताकत का अहसास कराया बल्कि ये बताने की कोशिश भी की कि अब यूपी की राजनीति में एक और पार्टी का नाम जुड़ गया है, जिसके असर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. राजा भैया ने अपनी पार्टी का नाम जनसत्ता दल रखा है हालांकि इस पर आखिरी मुहर चुनाव आयोग को लगानी है.

यूं तो देश में राजे रजवाड़ों का दौर कब का बीत चुका है लेकिन उत्तर प्रदेश की पूर्व भदरी रियासत के राजकुमार राजा भैया का जलवा आज भी पहले की ही तरह कायम है. कुंडा में आज भी राजा भैया का दरबार सजता है. कहा जाता है कि उनकी कलम से निकला शब्द ही कानून है और ज़ुबान से निकला लफ्ज ही इंसाफ.

यूपी की सियासत में भी राजा भैया का दबदबा है यहां सरकार भले ही किसी भी पार्टी की रही हो लेकिन BSP को छोड़कर राजा भैया निर्दलीय विधायक के तौर पर हर पार्टी से साथ उसकी सरकार में अहम पद पर शामिल रहे. वक्त बदला, सरकारें बदलीं लेकिन नहीं बदला तो रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया का रुतबा.

बाहुबली विधायक राजा भैया

राजा भैया की पार्टी जनसत्ता के ऐलान के साथ ही ये साफ हो गया कि 2019 के चुनाव में राजा भैया बड़ी भूमिका में आने की तैयारी में हैं. अगर 2019 में जनसत्ता ताल ठोंकती है तो उसे ठाकुर बाहुल्य इलाकों से वोट मिल सकते हैं. जानकारों का मानना है कि प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, उन्नाव, अमेठी और रायबरेली से ठाकुर समुदाय के वोट जनसत्ता की झोली में आ सकते हैं.

वरिष्‍ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह बताते हैं कि अगर उन्‍हें दो-चार सीटें भी मिलती हैं तो वे नेगोशिएशन की टेबल पर बैठ सकते हैं. यूपी में ऐसा पहले भी हो चुका है जब दो-चार सीटों वालों ने भी मजबूती से दावेदारी पेश की है.

यूपी की राजनीति के जानकारों के मुताबिक ये वो वोट होंगे जो सीधे BJP के खाते से कटेंगे. क्योंकि यूपी की राजनीति में कांग्रेस, बीएसपी और एसपी को नहीं बल्कि बीजेपी को ही ठाकुरों के वोट मिलते रहे हैं.

शेष नारायण सिंह कहते हैं, 'बीजेपी से वहां बहुत नाराजगी है. अपर क्‍लास यानी सवर्ण वर्ग काफी नाराज है कि सुप्रीम कोर्ट ने जब एससी-एसटी कानून को कमजोर कर दिया था तो आपने उसे बदला क्‍यों. आपने नया कानून क्‍यों बनाया. उससे लोग नाराज हैं.'

2019 में अगर जनसत्ता समानजनक सीटों पर कब्ज़ा करने में कामयाब हो गई तो वो अपनी शर्तों पर किसी पार्टी को सपोर्ट भी कर सकती है. लेकिन सवाल उठता है कि जनसत्ता किस पार्टी के साथ नाता जोड़ सकती है. जानकारों की मानें तो कांग्रेस जनसत्ता से हाथ नहीं मिलाएगी क्योंकि अमेठी और रायबरेली में राजा भैया ने कांग्रेस को बड़ा नुकसान पहुंचाया था. बसपा से भी जनसत्ता का नाता नहीं जुड़ेगा क्योंकि राजा भैया और उनके पिता पर केस दर्ज करके उन्हें सलाखों के पीछे पहुंचाने वाली मायावती से उनकी पूरानी अदावत है.

समाजवादी पार्टी से नाता न जुड़ने की वजह अखिलेश यादव हैं जो कभी राजा भैया के समर्थन में नहीं रहे. ऐसे में सिर्फ BJP ही एक ऐसी पार्टी है जिसके साथ राजा भैया गठबंधन कर सकते हैं क्योंकि राजनाथ से लेकर योगी आदित्यनाथ तक राजा भैया के संबंध अच्छे माने जाते हैं.

रैली में राजा भैया

यूपी में रिकॉर्ड आंकड़ों से जीत हासिल करने वाली बीजेपी के पास योगी भी हैं और मोदी भी ऐसे सवाल ये कि BJP राजा भैया की जनसत्ता से हाथ क्यों मिलाएगी, उसके पीछे बड़ी वजह है गठबंधन से होने वाले नुकसान को कम करना. इसी साल हुए लोकसभा उपचुनाव में BJP को फूलपुर और गोरखपुर में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था. वजह थी कांग्रेस, एसपी और बीएसपी का वो गठबंधन जिसने BJP के सियासी समीकरण को बिगाड़ दिया था. ऐसे में 2019 में अगर फिर ऐसा हुआ तो गठबंधन BJP के लिए एक बार फिर सिरदर्द बन सकता है. ऐसे में राजा भैया की भूमिका अहम हो जाती है.

बीजेपी से उनका अच्‍छा संबंध है. राजनाथ सिंह से उनके रिश्‍ते हैं. अगर कहीं जाना ही हुआ तो वे बीजेपी के साथ जाएंगे. कांग्रेस के साथ उनका कोई संबंध रहा नहीं है.

शेष नारायण सिंह, वरिष्‍ठ पत्रकार

चाहे BJP हो या कोई और पार्टी, राजा भैया से हाथ मिलाने पर सवाल उठने तय हैं. वजह है राजा भैया के उपर लगे आरोपों की लंबी फेहरिस्त. 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान जो हलफनामा उन्होंने चुनाव आयोग में दाखिल किया, उसके मुताबिक उनके खिलाफ आठ मामले लंबित हैं. इनमें हत्या की कोशिश, हत्या की मंशा से अपहरण, डकैती जैसे मामले शामिल हैं. इसके अलावा उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एक्ट के तहत भी उनके खिलाफ मामला चल रहा है.

विवादों के राजा भैया
2002 में राजा भैया BJP विधायक को जान से मारने की धमकी के आरोप में गिरफ्तार हुए.
इसी साल राजा भैया और उनके पिता उदय प्रताप सिंह के ख़िलाफ़ डकैती और घर क़ब्ज़ाने का मुकदमा दायर हुआ.
2002 में ही राजा भैया के घर से हथियार और विस्फ़ोटक बरामद हुए.
जिसके आरोप में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने राजा भैया और उनके पिता उदय प्रताप सिंह को जेल भेज दिया.
छापेमारी में राजा भैया के तालाब से कंकाल भी बरामद हुए जिसके बाद उनके ख़िलाफ पोटा के तहत केस भी दर्ज हुआ.
लेकिन 2003 में समाजवादी पार्टी की सरकार ने राजा भैया के ऊपर लगे केस हटा लिए.
इसके बाद 2013 में राजा भैया पर डिप्टी एसपी ज़िया-उल-हक़ की हत्या का आरोप लगा. लेकिन CBI जांच में उन्हें क्लीन चिट मिल गई.

इन सब के बीच राजा भैया का रुतबा और दबदबा कायम रहा राजपूत समाज उनके साथ पूरी तरह से खड़ा रहा. 2002 से 2003 तक राजा भैया जेल में रहे और इस दौरान कई ज़िलों में राजा भैया के समर्थन में राजपूत समाज के लोगों ने मायावती के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया और उनके साथ मज़बूती से खड़े रहे. ये राजा भैया का ही जलवा था कि जेल से बाहर आते ही 2004 में वो एसपी सरकार में कैबिनेट मंत्री बने और फिर 2012 की अखिलेश सरकार में जेल मंत्री.

राजनीति की बारीक चाल को समझने वाले राजा भैया का दावा है कि वो अब अपनी राजनीतिक पार्टी जनता के एक सर्वे के बाद ही ला रहे हैं.

बकौल रघुराज प्रताप सिंह, 'पार्टी बनाने से पहले एक सर्वे कराया गया. इसमें 80 प्रतिशत लोगों ने कहा कि स्‍वयं की पार्टी बनाई जाए.'

राजा भैया पर अनुसूचित जाति विरोधी होने के आरोप भी लगते रहे जिसे अब वो नकार रहे हैं उनका दावा है कि वह अनुसूचित जाति विरोधी नहीं बल्कि आरक्षण विरोधी हैं. वे कहते हैं, 'हम किसी के विरोध में नहीं है. आज अनुसूचित जाति को जिस स्‍तर पर होना चाहिए वे उस स्‍तर पर नहीं हैं.'

शिवपाल यादव और रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया (फाइल)

हालांकि समाजवादी पार्टी से अलग होने वाले शिवपाल यादव ने भी अपनी अलग पार्टी बनाई है माना जा रहा है कि राजा भैया उनसे भी हाथ मिला सकते हैं. शिवपाल के साथ जाने के सवाल पर राजा भैया ने कहा कि लोकतंत्र में जो जनता चाहती है वह होता है. इसलिए यह कोई चिंता की बात नहीं कि कौन पार्टी पचा पा रही है और कौन नहीं.

वहीं अगर बीजेपी और राजा भैया ने हाथ मिलाया तो भी कई सवाल खड़े होंगे. लेकिन फिलहाल बीजेपी नेता इसपर ख़ामोश हैं. राजनीतिक दल के रूप में उनका कितना प्रभाव है यह तो आने वाले दिनों में जनता ही तय करेगी.

हरीश द्विवेदी, बीजेपी प्रवक्‍ता

इस बीच समाजवादी पार्टी ने राजा भैया को उनकी पार्टी के लिए शुभकामनाएं भी दीं और नसीहत भी. पार्टी प्रवक्‍ता जूही सिंह ने कहा कि अभी तक उन्‍होंने व्‍यक्तिगत प्रभाव की राजनीति की है. सबको साथ लेकर उनके लिए नया अनुभव होगा.

कांग्रेस ने भी राजा भैया की पार्टी का लोकतंत्र में स्वागत किया लेकिन इशारों में ही तंज भी कस दिया. कांग्रेस प्रवक्‍ता अशोक सिंह ने कहा, सबको पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने का अधिकार है.

जानकारों का मानना है कि राजा भैया की पार्टी को जनसमर्थन तभी मिलेगा जब मुद्दे सिर्फ वोट बैंक के लिए न हों. वरिष्‍ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह ने बताया कि अभी भविष्‍यवाणी करना जल्‍दबाजी होगा लेकिन जिन मुद्दों पर वे जनता के बीच में जा रहे हैं उन पर उन्‍हें अपार जनसमर्थन मिलेगा.

इन दिनों हिन्दुत्व की राजनीति देश में हावी है लेकिन कहा जाता है कि राजा भैया का परिवार काफी पहले से राम के नाम का प्रचार करता रहा है.

कुल मिलाकर साफ है कि यूपी इस समय देश की राजनीति की धुरी है और हर राजनीतिक दल ये बखूबी जानता है कि यूपी की सियासत में सफल होंगे तभी दिल्ली जीत पाएंगे. लेकिन यूपी में हिंदुत्व और जात पात की राजनीति हावी है जिसमें सभी दल शामिल हैं. यही वजह है कि रघुराज प्रताप सिंह ने सवर्णों से जुड़े मुद्दों का एलान कर एक नई सियासी पार्टी भी बना ली.

राजा भैया ने अपना सियासी सफर 1993 में 24 साल की उम्र में शुरू किया था तब से लेकर आज तक वो 6 बार से कुंडा से विधायक हैं. ये उनका रसूख, रुतबा और दबदबा ही है कि उनके सामने कभी विरोधियों ने आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं की. लेकिन जब उनकी पार्टी प्रतापगढ़ से बाहर चुनाव लड़ेगी तो क्या तब भी यही रुतबा और जीत बरकरार रह पाएगी.