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आवारा कुत्तों को दूध पिलाते हैं यहां के दूधिया, भरते हैं 400 कुत्तों का पेट

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हर शहर की तरह दिल्ली में भी आवारा कुत्तों की तादाद बहुत अधिक है। कहते हैं ईश्वर हर किसी मदद के लिए किसी मसीहा को भेजता है, ऐसे ही दो मसीहा हर रात इन्हें खाना खिलाने आते हैं। ये कोई बड़े घरों से ताल्लुक रखने वाले नहीं, बल्कि हमारे घरों में दूध पहुंचाने वाले हैं। इनका नाम है रोहित और राहुल, जो दूध बेचने का काम करते हैं। दोनों भाई हर रोज़ पूर्वी दिल्ली की गलियों में अपनी कार लेकर निकल जाते हैं और तकरीबन 400 अावारा कुत्तों का पेट भरते हैं।
इन्हें देखते ही कॉलोनी के सभी आवारा कुत्ते दोनों को घेर लेते हैं और ये एक-एक कर सभी को दूध और चिकन खिलाते हैं। Dogs से इन्हें बहुत लगाव और इसी प्यार का नतीजा है कि हर रोज़ पूरे दो घंटे आधी दिल्ली में घूम कर सैंकड़ों कुत्तों और लगभग 50 बिल्लियों को खाना खिलाते हैं।
उनके इस कदम का कई लोग विरोध भी करते हैं। उनका मानना है कि वो ऐसा कर के आवारा कुत्तों को यहीं रहने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं। क्योंकि वो उन्हें बोझ समझते है, जो कभी उनकी कार के आगे आ जाते हैं, तो कभी खाते समय पूंछ हिलाते उनके पास पहुंच जाते है।
ये लोग भी रोहित और राहुल के हौसलों को कम नहीं कर पाए हैं। पशुओं से प्रेम करने की ये आदत इन्हें अपने पिता से विरासत में मिली है। उनके पिता भी ऐसे ही स्ट्रे डॉग्स को खाना खिलाते थे। दोनों ने फ़र्स्ट एड की ट्रेनिंग भी ले रखी है, ताकि किसी जख़्मी कुत्ते का इलाज कर सकें। लेकिन उन्हें इस बात का मलाल भी होता है कि कई बार वो गंभीर रूप से घायल जानवरों को बचा नहीं पाते।
उन्हें न तो वक्त पर वेटरनिटी एंबुलेंस मिलती है और न ही ज़रूरी सर्जरी। प्राइवेट पेट हॉस्पिटल में ख़र्च अधिक होता है। इस काम में हर महीने तकरीबन 20 हज़ार रुपये का ख़र्च आता है। मगर कभी भी उनके चेहरे पर इस बात को लेकर शिकन नहीं आती। वो इसके लिए किसी की मदद भी नहीं लेते। उनका मानना है कि वो एक तरह से सेवा कर रहे हैं, जो उनका धर्म है।
ख़ास बात ये है कि रोहित और राहुल इन्हें इनके नाम से बुलाते हैं। उनके घर में भी 30 कुत्ते रहते हैं। उन्हें इनसे इतना प्यार है कि पिछले 19 सालों से वो इनको छोड़ कर छुट्टियों पर नहीं गए। इन्हें सिस्टम से इस बात की शिकायत है कि इनकी रक्षा के लिए वो कुछ नहीं कर रहा।
1960 के Prevention of Cruelty to Animals Act के बाद से अभी तक पशुओं की रक्षा के लिए कोई नियम नहीं बना। ये कानून काफ़ी पुराना है और इसमें मामूली सज़ा और जुर्माने का प्रावधान है। 2001 में Animal Welfare Board of India ने इसे और सख़्त बनाने के लिए इसमें संशोधन किया था, मगर अभी तक इसे संसद में पेश नहीं किया गया है।