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जहरीली हवा के चलते दिल्‍ली छोड़ रहे हैं लोग, दूसरे राज्‍यों का बना रहे ठिकाना

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दिल्‍ली धुएं के चलते बदनाम हो चुकी है. यह शहर पूरी दुनिया का सबसे ज्‍यादा प्रदूषित महानगर है. इसके चलते दिल्‍लीवासी शहर छोड़कर दूसरी जगहों का रूख कर रहे हैं ताकि सेहतमंद रह सकें. दिवाली के बाद से लगातार दिल्‍ली की हवा भयानक स्‍तर पर जहरीली रही है. पूर्व पत्रकार ट्रेसी शिल्‍शी बताती हैं, 'यहां जीना मुहाल हो रखा है. साल 2017 में दिवाली के बाद जहरीला धुआं असहनीय हो गया है. उनके बच्‍चों को सुरक्षा के चलते घर के बंद दरवाजों में रहना पड़ा.'

शिल्‍शी ने अब दिल्‍ली का अपना घर छोड़ने का फैसला किया है और वह गोवा शिफ्ट हो गई हैं. उनके सबसे छोटे बेटे को काफी समय से हल्‍की खांसी और नाक बहने की शिकायत है. उनके पिता को भी लंबे समय से खांसी हैं. शिल्‍शी ने बताया कि ये दोनों बीमारियां प्रदूषण की वजह से है. उन्‍होंने नौ महीने पहले दिल्‍ली छोड़कर गोवा को अपना ठिकाना बना लिया और इस फैसले से वह काफी खुश हैं.

हालांकि अभी तक शहर छोड़ने का फैसला बड़े स्‍तर पर नहीं उठाया गया है लेकिन कई लोग इस विकल्‍प पर विचार कर रहे हैं. एक सोशल नेटवर्किंग साइट लोकल सर्कल्‍स के सर्वे के अनुसार, दिल्‍ली और एनसीआर में रहने वाले लगभग 35 प्रतिशत लोग यहां से दूसरी जगह बसना चाहते हैं. इसकी वजह प्रदूषण है. सर्वे के अनुसार, 30 प्रतिशत लोगों ने बताया कि पिछले तीन सप्‍ताह में उनके परिवार से किसी न किसी को वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारी के चलते डॉक्‍टर के पास जाना पड़ा है.

सर्वे में शामिल हुए लोगों ने बताया कि उन्‍हें प्रशासन में बिलकुल विश्‍वास नहीं है कि वह प्रदूषण से निजात दिला पाएगा. 26 प्रतिशत लोगों ने बताया कि वे दिल्‍ली में ही रहेंगे लेकिन एयर प्‍यूरीफायर और मास्‍क जैसी चीजों के जरिए खुद को प्रदूषण से बचाएंगे. लोकल सर्कल्‍स के सीईओ और चेयरमैन सचिन तपरिया ने बताया कि प्रदूषण की वजह से लोगों का शहर छोड़ने का फैसला चौंकाता नहीं है.

बकौल तपरिया, 'यदि दिल्‍ली में रहने से उम्र घटती है तो कोई भी माता-पिता चिंतित हो जाएंगे और यदि मौका है तो वहां से निकलने के लिए कहेंगे.'

सर्वे से पता चलता है कि खराब हवा के चलते 57 प्रतिशत लोगों को स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़ी समस्‍याएं हुईं. इसी वजह से उद्यमी गौरव अग्रवाल ने दिल्‍ली छोड़ने का फैसला लिया. उन्‍होंने अब बेंगलुरु को अपना नया बसेरा बनाया है. उनका कहना है कि वे अब कभी भी दिल्‍ली नहीं आएंगे.

उनका कहना है, 'मैं यहीं पला बढ़ा हूं. मेरे माता-पिता यहां साल 1965 से रह रहे हैं.' काम के चलते अग्रवाल बेंगलुरु चले गए लेकिन उनकी मां दिल्‍ली में रहती है. लेकिन उन्‍होंने बेंगलुरु में ही रहने का फैसला लिया. इसके चलते उनकी मां को दिल्‍ली में अकेले ही रहना होगा. उनके पिता की कुछ दिन पहले ही मौत हो गई थी. इस बारे में गौरव कहते हैं, 'यह मुश्किल फैसला था. दिल्‍ली वापस जाने का मतलब है अपने बच्‍चों को गैस चैम्‍बर में धकेलना.'