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अब वारंटी खत्म होने के बाद भी कंपनी सुधारेगी आपके खराब इलेक्ट्रॉनिक सामान

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आप योजना बनाकर और काफी पैसे लगाकर कोई सामान खरीदते हैं लेकिन वारंटी खत्म होते ही सामान जवाब देने लगता है और जल्द ही फेंकने की नौबत आ जाती है. आप इसे बनवा नहीं सकते और न ही बेच सकते हैं. ये इलेक्ट्रॉनिक जंक का हिस्सा बन जाएगा. यानी आपके नुकसान के साथ ये पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा रहा है.

इसी को देखते हुए यूरोपीय देशों और अमेरिका में राइट टू रिपेयर मुहिम चल पड़ी है. नीतियों में बदलाव के जरिए मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर सख्ती बरतने की तैयारी चल रही है. जानिए, क्या है राइट टू रिपेयर और इसके क्या फायदे आपको भी मिल सकते हैं.

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यह ग्राहकों और पर्यावरण के हित में शुरू हुई मुहिम है. यूरोप के साथ 18 अमेरिकी राज्य भी राइट टू रिपेयर की मांग कर रहे हैं. इसके तहत पर्यावरण से जुड़ी सस्थाएं और मंत्री ये मांग कर रहे हैं कि मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां ऐसी चीजें बनाएं जो टिकाऊ हों.

वे ये भी चाहते हैं कि वारंटी खत्म होने के बाद कंपनी सर्विसिंग के अलावा लोकल मैकेनिकों को भी किसी खास सर्वस की ट्रेनिंग मिले. इससे ग्राहकों के पास विकल्प होंगे और कम लागत में काम हो सकेगा. कन्ज्यूमर रिपोर्ट्स और आईफिक्सिट ऐसी दो बड़ी संस्थाएं हैं जो इस मुहिम का ड्राफ्ट तैयार कर रही हैं.

इलेक्ट्रॉनिक कंपनियों की मनमानी के खिलाफ खुले मोर्चे के तहत यूरोपीय संघ के मंत्री कई प्रस्तावों की सीरीज तैयार कर चुके हैं. वे प्रस्ताव दे रहे हैं कि इलेक्ट्रॉनिक सामानों के निर्माता ऐसे सामान बनाएं जो लंबे समय तक चलें. हालांकि राइट टू रिपेयर का रास्ता आसान नहीं दिख रहा.

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कंपनियां जोर-शोर से इसका विरोध कर रही हैं. रिपेयरिंग से जुड़े कानून काफी सख्त हैं. साथ ही कंपनियों का मानना है कि एक ही बार में ज्यादा लंबा चलने वाले प्रोडक्ट बनाने पर नई खोजों को बढ़ावा नहीं मिल सकेगा. अभी असंतोष ही काम में नयापन लाने का आधार है.

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उपभोक्ता अधिकारों पर काम करने वाली संस्थाओं के अनुसार यूरोपीय संघ भी निर्माता कंपनियों के साथ सहानुभूति रखता है और ग्राहक अधिकारों की दिशा में काम नहीं कर रहा है. यूरोपीय पर्यावरण ब्यूरो (ईईबी) के अनुसार कई ऐसे प्रोडक्ट हैं, जिनकी मरम्मत बाहरी मैकेनिकों के लिए नामुमकिन होती है क्योंकि उसके अधिकार कंपनी अपने ही प्रशिक्षित कामगारों के लिए रखती है. इससे सामान खराब होने पर ग्राहक की मजबूरी होती है कि वो कंपनी के पास ही जाए चाहे उसे कितनी ही ज्यादा कीमत देनी पड़े.

क्यों पड़ी इस मुहिम की जरूरत
पिछले कुछ सालों में निर्माता कंपनियों के प्रोडक्ट्स की क्वालिटी लगातार गिरी है. एक शोध के अनुसार 2004 से 2012 के दौरान होम अप्लायंसेस की क्वालिटी में तेजी से गिरावट आई. 2004 में इलेक्ट्रॉनिक मशीनें पांच सालों तक ठीक से चला करतीं और इसके बाद भी लगभग 3.5 फीसदी मशीनें खराब हो रही थीं. साल 2012 में ये प्रतिशत बढ़कर 8.3 हो गया. इसके बाद आ रही मशीनें पांच साल भी ठीक से नहीं चल पा रही हैं.

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यूरोप में ही कई ऐसे लैंप हैं जिनका बल्ब खराब होने के बाद दोबारा नहीं बदला जा सकता, बल्कि पूरा का पूरा लैंप फेंकना होता है. ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सामानों की वजह से निकलने वाली जहरीली गैस वातावरण को प्रदूषित कर रही है. जल्दी खराब होने के बाद ये ई-जंक या इलेक्ट्रॉनिक कबाड़ में बदल जाती है, जिसे रिसाइकल करना भी काफी मुश्किल है.

इन हालातों में राइट टू रिपेयर मुहिम के जरिए यूरोपीय संघ और अमेरिकी राज्य ग्राहकों और पर्यावरण के हित में बात कर रहे हैं.