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मराठी साहित्य सम्मेलन, ट्राफ़िक सिग्नल पर खड़ा महाराष्ट्र

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यद्यपि मैंने नयनतारा सहगल की कोई किताब नहीं पढ़ी है, लेकिन मैं उनको इस बात के लिए धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने एक बार फिर हमारे समाज की कमज़ोरी उजागर करते हुए यह दिखा दिया है कि हम कितने रीढ़-विहीन हो गए हैं.

मामला है मराठी साहित्य सम्मेलन का, जिसके आयोजकों ने इसके लिए सहगल को भेजे गए आमंत्रण को रद्द कर दिया है. उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उन्हें आशंका थी कि उनकी उपस्थिति का दक्षिणपंथी समूह और उससे जुड़े लोग विरोध कर सकते हैं.

मुझे लगता है कि मैं और मेरे जैसे ही अन्य बहुत सारे लोग जो तर्कों को मानते हैं और क़ानून पर आधारित एक उदार समाज में विश्वास करते हैं, वे सब ट्राफ़िक सिग्नल पर खड़े ऐसे बेसहारा पैदल यात्री की तरह हैं, जो बिना चोट खाए और जान गंवाए सड़क पार करना चाहते हैं. मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं, यह नीचे स्पष्ट करता हूं।

यद्यपि पैदल यात्रियों को भी सड़क का प्रयोग करने का अधिकार है, न तो मोटर चालक और न ही ट्राफ़िक विभाग को इनकी कोई चिंता है. यही बात आप मराठी साहित्य सम्मेलन के बारे में भी कह सकते हैं. अगर सहगल को आमंत्रित किया जाता है, तो यह उम्मीद करना सामान्य बात है कि वो आएंगी और अपने विचार रखेंगी। लेकिन अब हमें इससे वंचित होना पड़ेगा.

पैदल चलनेवालों की संख्या ज़्यादा होती है पर उनमें मोटर वाहन जैसी शक्ति नहीं होती है कि वे नियम को तोड़कर गाड़ी चलानेवाले ड्राइवरों से झगड़ा कर सकें. चूंकि क़ानून को मानने वाला और उदार विचार का नागरिक गुंडागर्दी में विश्वास नहीं करता है, ये गुंडे यह समझते हैं कि इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है और यही कारण है कि जंगलराज जारी रहता है.

किसी कार ड्राइवर के साथ झगड़ा होने पर बाइक चलानेवाले लोग आपस में एक हो जाते हैं. इसके बावजूद कि वे एक दूसरे को नहीं जानते, लेकिन पैदल यात्री ऐसा कभी नहीं करते. एक पीड़ित समूह के रूप में वे अपने अधिकारों के लिए कभी आवाज़ नहीं उठाते. उदार लोग भी ऐसे ही हैं जो बहुसंख्यकों के आक्रमण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने से डरते हैं. भारत में किसी मुद्दे पर संगठित होने से पहले धर्म, जाति और भाषा जैसी बाधाओं को पार करना ज़रूरी होता है.

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और अंत में, वे लोग जो ख़ुद को मराठी लेखक और बड़े रचनाकार कहते हैं, आज वे क्यों चुप हैं? विरोध करने का माद्दा कब जागेगा उनमें? क्या कोई सिर्फ़ अपने किताबों की प्रतियाँ बेचकर ही कलाकार और लेखक बन सकता है? क्या ये बड़े साहित्यकार लोग तब तक नहीं बोलेंगे जब तक कि उनकी ख़ुद की किताब पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता? अगर अभी वे इस तरह चुप्पी लगाए बैठे रहेंगे तो उनके लिए कौन आवाज़ उठाएगा?

साहित्य सम्मेलन प्रमुख अरुणा धेरे का अभी इस मामले में कोई बयान नहीं आया है. अगर वे यह उम्मीद करती हैं कि पाठक उनको चतुर, ईमानदार और सही सोच का धनी समझे, तो उन्हें तुरंत आगे आकर अपने रूख को स्पष्ट करना चाहिए.

अगर महाराष्ट्र यह समझता है कि किसी लेखक को समर्थन देने के लिए विचारधारा और पसंद पहली शर्त है, तो उनके लिए बेहतर होगा कि वे पहले तुकाराम और नामदेव को इतिहास की किताबों से बेदख़ल कर दें, क्योंकि बेईमान होने के लिए भी न्यूनतम ईमानदारी तो चाहिए.