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Analysis: पूर्वांचल में BJP की चाल से 'कमल' को घेरने की कोशिश में कांग्रेस, चला ये बड़ा दांव!

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उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में उम्मीदवारों की सूची से पार्टी की रणनीति कुछ साफ हुई है. पार्टी ने पूर्वांचल की जिन आठ सीटों पर जो टिकट बांटी है, उससे लग रहा है कि कांग्रेस प्रदेश के पूर्वी हिस्से में बीजेपी को उसी की चाल से घेरने में लगी है. इसके अलावा वाराणसी से कांग्रेस के टिकट के दावेदार राजेश मिश्रा को पार्टी ने सलेमपुर से उतार दिया है. पार्टी ने इस तरह से वाराणसी को लेकर अटकलबाजी के लिए भी पर्याप्त जगह बना दी है. इसी सूची में लखनऊ से लगी मोहनलालगंज सीट भी है, जहां से पार्टी ने अपना प्रत्याशी बदल दिया है. यहां से आर के चौधरी को कांग्रेस ने टिकट थमाया है.

पार्टी ने उन जाति के उम्मीदवारों को इस बार खोज-खोज कर टिकट दिया है, जो 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के साथ थे. उत्तर प्रदेश के संदर्भ में ये एक सच्चाई है कि यहां सभी दलों के पास अपना एक वोट बैंक है. इस वोट बैंक में अगर कोई छोटा समुदाय आकर जुड़ जाता है तो ये उस पार्टी के लिए मूल पर मिले सूद जैसा हो जाता है. यही अतरिक्त समर्थन पार्टी की स्थिति मजबूत करता रहा है.

बीजेपी ने इसे बखूबी समझा. यही वजह है कि कुर्मी, निषाद, कुशवाहा और राजभर जैसी जातियों को भी अपने साथ जोड़ा था. ये भी कहा जा सकता है कि न तो सपा और न ही बसपा ने इन वर्गों के नेताओं को समुदाय की अपेक्षाओं के अनुरूप सम्मान दिया. बीजेपी को इसका भी फायदा मिला था. हालांकि इन वर्गों की अपेक्षाएं बड़ी हैं और अब ये अपनी पूरी हिस्सेदारी से कम नहीं चाहते. इसी का सबूत है कि बीजेपी को निषादों को रोकने में बड़ी कवायद करनी पड़ी.

कांग्रेस में जब प्रियंका गांधी को पूर्वांचल की जिम्मेदारी दी गई, उसी समय से रणनीतिकारों को लग रहा था कि इस वर्ग को अपने साथ लेकर कांग्रेस मजबूत हो सकती है. यही कारण है कि सड़क यात्रा की बेहतरीन सुविधाएं होने के बाद भी प्रियंका ने गंगा यात्रा की और निषादों, मल्लाहों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की. प्रियंका और उनकी टीम इन समुदायों को जोड़ने की रणनीति पर काम करते रहे.

इस शनिवार को कांग्रेस पार्टी ने पूर्वांचल की आठ सीटों पर जिस तरह से अपने उम्मीदवार दिए, उनमें एक सलेमपुर, जौनपुर और बस्ती को छोड़कर बाकी सभी सीटें पिछड़े वर्ग को दे दी. ये भी देखने वाली बात है कि बीजेपी के लिए सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा वाली वाराणसी के आस पास की गाजीपुर, चंदौली और भदोही सीटों से पिछड़े उम्मीदवार ही उतारे गए हैं. अलबत्ता जौनपुर से एक ब्राह्मण देवव्रत मिश्र को पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया है. लेकिन गोंडा सीट से कृष्णा पटेल को टिकट दिया है, जो अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की पत्नी और अनुप्रिया पटेल की माता हैं. पटेल यानी कुर्मी समुदाय के वोटर वाराणसी में अच्छी खासी संख्या में हैं.

अनुप्रिया पटेल (File Photo)

बगल की सीट, भदोही से पार्टी ने रमाकांत यादव को टिकट दिया है, तो कभी भदोही से लड़ने और जीतने वाली फूलन देवी के पति उम्मेद सिंह निषाद को अकबरपुर से टिकट थमा दिया है. हालांकि अकबरपुर में एक लाख से ज्यादा वोटर निषाद समुदाय के बताए जा रहे हैं, लेकिन उम्मेद का संदेश निषाद समुदाय तक जाएगा ही.

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आजमगढ़ से मुलायम सिंह यादव के खिलाफ चुनाव लड़ चुके रमाकांत यादव की अपने समुदाय में अच्छी पकड़ है. वे बीजेपी से पाला बदल कर कांग्रेस में आए हैं. चंदौली से पार्टी टिकट पर उतारी गईं शिवकन्या कुशवाहा बाबूसिंह कुशवाहा की पत्नी हैं. यही नहीं वाराणसी से लगी गाजीपुर सीट से भी कुशवाहा समुदाय के अजित प्रताप को उतारने से मौर्या-कुशवाहा वोटरों को पार्टी अपनी ओर खींच सकेगी.
मुलायम सिंह यादव (File Photo)

पार्टी ने बस्ती से राजकिशोर सिंह को टिकट दिया है, जो विधायक और अखिलेश सरकार में मंत्री रह चुके हैं. तो मोहनलालगंज से प्रत्याशी बदल कर आरके चौधरी को उतारा है. ये आरके चौधरी वही हैं जो कभी बीएसपी के कद्दावर नेता और मंत्री रहे हैं.

देश की चुनावी राजनीति पर गहरी नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश इसे कांग्रेस के लिए फायदेमंद पहल के तौर पर देखते हैं और कहते हैं कि इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा. उनके मुताबिक, ये समावेशी राजनीति है. उनका कहना है कि उत्तर भारत में कांग्रेस अब तक इन वर्गों का समावेश नहीं करती रही है. उनके मुताबिक- "हाल में राज्य विधान सभाओं के चुनाव के दौरान छत्तीगढ में कांग्रेस ने इसका प्रयोग किया और नतीजा ये हुआ कि भूपेश बघेल की अगुवाई में कांग्रेस ने बीजेपी को उखाड़ दिया." उर्मिलेश ये भी कहते हैं बघेल खुद भी पिछड़े वर्ग से हैं.

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह का कहना है कि 2014 में यही छोटे छोटे सुमूह थे जिनके बल पर बीजेपी 2014 में अभूतपूर्व प्रदर्शन कर सकी. वाराणसी में भी पत्रकारिता कर चुके राजकुमार सिंह का ये भी कहना है -" ये मौका कांग्रेस को इस कारण भी मिल पा रहा है क्योंकि प्रदेश की दो बड़ी क्षेत्रीय पार्टिया गठबंधन करके आधी आधी सीटों पर लड़ रही है. लोकसभा की तैयारी करने वाले उनके आधे-आधे नेता टिकट न पाने के कारण खाली हो रहे हैं. इससे 1989 के बाद से ही जमीनी नेताओं के टोंटे से जूझ रही कांग्रेस को नेता भी मिल रहे हैं."

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