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फिर सवालों के घेरे में EVM: इसकी विश्वसनीयता के लिए बनी VVPAT कैसे करती है काम?

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लोकसभा चुनाव 2019 के पहले चरण के मतदान में ही कई जगहों पर बीजेपी विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं, नेताओं ने (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) पर सवाल उठाए. नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने दावा किया कि जम्मू-कश्मीर के पुंछ में एक ईवीएम (EVM) में कांग्रेस (Congress) का बटन काम नहीं कर रहा. उमर अब्दुल्ला ने यह दावा ट्वीट करके किया है.  यूपी में भी कई जगहों पर ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगे हैं.

हालांकि ईवीएम  की विश्वसनीयता कायम रखने के लिए ही आयोग इस बार सभी सीटों पर वीवीपैट (वोटर वेरीफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल यानी वीवीपैट) का इस्तेमाल कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने EVM-VVPAT का औचक मिलान करने संबंधी विपक्ष की याचिका पर निर्देश दिया था. बीजेपी विरोधी कई पार्टियां ईवीएम पर सवाल उठाकर बैलेट से चुनाव करवाने की मांग करती रही हैं. जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला ने तो ईवीएम को 'चोर मशीन' तक कह दिया था.  यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि किसी तरह का विवाद होने पर ईवीएम में पड़े वोट के साथ पर्ची का मिलान किया जा सके. (ये भी पढ़ें:  Loksabha Election 2019: कैराना के बारे में क्या ये खास बात जानते हैं आप? )

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औचक मिलान तो किया ही जाएगा. समाचार एजेंसी ANI के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने आगामी आम चुनावों में हर निर्वाचन क्षेत्र से EVM- VVPAT के औचक मिलान के लिए EVM की संख्या बढ़ा दी है. सुप्रीम कोर्ट ने यह संख्या 1 से बढ़ा कर पांच कर दी है. हालांकि, विपक्ष ने मांग थी कि एक निर्वाचन क्षेत्र में कम से कम 50 फीसदी वीवीपीएटी पर्चियों की मिलान किया जाए.

दरअसल, ईवीएम पर उठ रहे सवालों ने ही वीवीपैट काे जन्म दिया.. इसे ईवीएम मशीन के साथ जोड़ा जाता है. वीवीपैट व्यवस्था के तहत वोट डालने के तुरंत बाद कागज की एक पर्ची बनती है. इस पर जिस उम्मीदवार को वोट दिया गया है, उनका नाम और चुनाव चिह्न छपा होता है. बाद में पर्ची एक बॉक्स में गिर जाती है. मतदाता इसे अपने घर नहीं ले जा सकता.

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कैसे काम करती है वीवीपैट?
इसे ईवीएम मशीन के साथ जोड़ा जाता है. वोटर विजुअली सात सेकंड तक देख सकता है कि उसने किसे वोट किया है, यानी कि उसका वोट उसके अनुसार ही पड़ा है या नहीं.  वोट डालने के तुरंत बाद VVPAT से कागज की एक पर्ची निकलती है.  इस पर जिस उम्मीदवार को वोट दिया गया है, उनका नाम और चुनाव चिह्न छपा होता है. इससे पता चल जाता है कि जिसे वोट दिया उसी को वोट गया या फिर इसमें कोई गड़बड़ी हो गई.

निजी कंपनी से वीवीपैट बनवाना चाहती थी सरकार!
इस बीच चुनाव आयोग ने सरकार के उस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया, जिसमें सरकार की ओर से VVPAT मशीनों को प्राइवेट सेक्टर से खरीदने की सलाह दी गई थी. चुनाव आयोग ने सरकार से कहा है कि अगर ऐसा होता है तो आम आदमी के विश्वास को ठेस पहुंचेगी.

कौन करता है निर्माण
भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) बंगलूरू और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ECIL) हैदराबाद ने यह मशीन 2013 में डिजाइन की. दोनों भारत सरकार के उपक्रम हैं. बीईएल रक्षा मंत्रालय के अधीन सैन्य, नागरिक उपकरण एवं संयंत्र बनाने वाली संस्था है. जबकि ECIL डिपार्टमेंट ऑफ ऑटोमिक इनर्जी का उपक्रम है. इन कंपनियों द्वारा निर्मित ईवीएम और वीवीपैट पर सवाल उठ रहे हैं.

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सबसे पहले कहां हुआ इस्तेमाल?
सबसे पहले इसका इस्तेमाल नगालैंड के चुनाव में 2013 में हुआ. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने वीवीपैट मशीन बनाने और इसके लिए पैसे मुहैया कराने के आदेश केंद्र सरकार को दिए.

बीईएल ने साल 2016 में 33,500 वीवीरपैट मशीन बनाईं. इसका इस्तेमाल गोवा के चुनाव में 2017 में किया गया. साल 2017 में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में आयोग ने 52,000 वीवीपैट का इस्तेमाल किया.

हालांकि, चुनाव आयोग ने जून 2014 में ही तय किया था कि 2019 के चुनाव में सभी मतदान केंद्रों पर वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाएगा.

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