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OPINION: चांद चुरा कर लाया हूं

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पंकज रामेन्दु

एनिमेशन फिल्म ‘डेस्पिकेबल मी‘ का नायक ग्रू जो फिल्म में एक सुपरविलेन है. सुपर इसलिए क्योंकि वो छोटा मोटा चोर नहीं है, उसकी चोरी में मिस्र का पिरामिड शामिल है. ग्रू को अपने एक प्लान को सफल बनाने के लिए पैसों की ज़रूरत है जिसके लिए वो चोरों के बैंक में लोन के लिए जाता है जहां प्रेज़िडेंट को उसका प्लान तो अच्छा लगता है लेकिन वो ग्रू से पहले ‘सिकोड़ने वाली रे’ को जमानत के तौर पर लाने के लिए बोलता है.

सिकोड़ने वाली रे जो हर बड़ी से बड़ी चीज़ को सिकोड़ देती है ताकि चोर उसकी चोरी आसानी से कर पाए. ग्रू जिसके मत्थे तीन अनाथ लड़कियां पड़ गई हैं, वो उन बच्चियों के जरिए अपने दुश्मन के घर से सिकोड़ने वाली रे चुराता है और बैंक से बात करता है. लेकिन इसी बीच उन अनाथ लडकियों की शैतानी की वजह से ग्रू का काम नहीं बन पाता है और बैंक से उसे लोन नहीं मिलता. आखिरकार ग्रू अपनी चुराई हुई सारी चीज़े बेचकर अपने लिए स्पेसशिप बनाता है और अपना प्लान पूरा करने निकल पड़ता है.

उसका प्लान है धरती के चांद को चुराना.

ग्रू इसमें सफल भी हो जाता है और समय रहते अपनी गोद ली हुई बेटियों के बैले प्रोग्राम को देखने भी पहुंच जाता है जिनसे वो अब धीरे धीरे प्यार करने लगा है. वहां उसे मालूम चलता है कि उसके दुश्मन ने तीनों लड़कियों को अगवा कर लिया है. उन्हें छुड़ाने की कीमत है - वही चांद.

आखिर वो अपने बरसों के सपने, अपने चुराए हुए चांद को दुश्मन को सौंप देता है. लेकिन सिकोड़ने वाली रे का प्रभाव ज्यादा देर तक नहीं रहता है और चांद धीरे-धीरे फिर से अपने आकार में आने लगता है. ग्रू वहां से अपनी बच्चियों को निकालता है, और चांद वापस अपने कक्ष में पहुंच जाता है.

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(AP Photo/Michael Probst)

चांद में कभी दिखी बुढ़िया, कभी खरगोश

चांद हम लोगों के लिए हमेशा से ही दूर चमकते हुए उस मोती की तरह रहा है जिसे हम बचपन से पा लेना चाहते हैं. दूर बैठे चंदा मामा को देखते हुए हम सभी ने बचपन से कोई न कोई सपना बुना है. हर किसी ने उसके अंदर अपने हिसाब से आकृतियां गढ़ी है. किसी को उसके अंदर सूत कातती हुई बुढ़िया नज़र आई तो किसी को उसमें एक खरगोश दिखा.

चांद पर पहुंचने वालों ने बताया कि चांद पर गड्ढे हैं जो हमें धरती से दिखते हैं लेकिन हम कभी उन गड्ढों को देख नहीं पाए या यूं कहिए चांद के साथ हमारी आत्मीयता हमें उसके अंदर किस्से और कहानियां ही दिखाती रही है.

बचपन के चंदा मामा में उम्र बढ़ने के साथ महबूब का चेहरा नज़र आने लगा. आशिक़ ने कभी उसे अपनी मोहब्बत का गवाह बनाया और कहा कि ओ रात के मुसाफिर चंदा ज़रा बता दे, मेरा कसूर क्या है तू फैसला सुना दे.

कभी किसी ने कहा कि ‘रात को चोरी से नंगे पांव चांद आएगा’, तो कभी किसी ने कहां कि चांद चुरा कर लाया हूं, चल बैठे चर्च के पीछे, देवदास ने पारों के चेहरे पर निशान छोड़ा और उससे कहा कि तुम्हें अपने साफ चेहरे पर घमंड ना हो इसलिए चांद की तरह दाग़ छोड़ रहा हूं.

कवियों की कल्पना में चंदा मामा भी थे और चकोर की मोहब्बत भी रही. कभी यही चांद किसी भूखे को रोटी की तरह भी दिखा, तो यही चांद ईद का भी था. साहित्य से लेकर ज्योतिष तक सभी ने चांद के साथ अपना रिश्ता जोड़ा. चांद के पूरे और आधे होने से मन में होने वाले अवसाद को जोड़ कर भी देखा जाता है. ऐसा माना जाता है कि चांद से समुद्र के पानी में ज्वार और भाटा आता है जो हमारी मन की तरंगो को भी डांवाडोल करता है. क्योंकि हम इंसानो का शरीर के अंदर पाया जाने वाला पानी समुद्र के पानी से मेल खाता है. यही वजह है कि ज्यादा क्रोध करने वालों को मोती की अंगूठी पहनाने का चलन हैं क्योंकि मोती समुद्र के पानी में रहता है लेकिन स्थिर रहता है उसके अंदर चांद की किरणों को अवशोषित करने की क्षमता होती है. हालांकि विज्ञान इस बात पर मुहर नहीं लगाता है.

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(AP Photo/Petros Karadjias)

11 साल पहले खुद के दम पर गए थे चांद पर

आज से 11 साल पहले 2008 को हम चांद पर खुद के दम पर गए थे. भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने चंद्रयान -1 मिशन को लॉन्च किया था. इस मिशन में रॉकेट दो पेलोड लेकर गया था, एक चांद का आर्बिटर था और दूसरा इंपैक्टर. इसी इंपैक्टर ने चांद की सतह पर खुदाई की और जांच के लिए मिट्टी के सैंपल लिए थे. इस तरह भारत दुनिया को चौथा देश बन गया था जिसने चांद की ज़मीन पर अपना झंडा फहराने का गौरव हासिल किया था. इसके पहले अमेरिका, रूस और जापान ऐसे देश थे जो चांद की ज़मीन पर कदम रख पाए थे.

अब 11 साल बाद हम फिर से जुलाई में चंद्रयान मिशन -2 के साथ चांद की ज़मीन पर जाने वाले हैं.

इस बार हम चांद पर कुछ खास खनिजों को खोजने के लिए जा रहे हैं. इससे चांद के बारे में हमें और भी बहुत कुछ मालूम चल जाएगा. हो सकता है आने वाले वक्त में बच्चे चांद पर पिकनिक मनाने जाएं. आज के बच्चों ने भले ही चांद को मामा कहना बंद कर दिया हो. भले ही आज के माता पिता उन्हें चांद को वैज्ञानिक तौर पर समझाते हो, हो सकता है बच्चे चांद के वैज्ञानिक पक्ष पर ज्यादा यकीन रखते हो. लेकिन कभी किसी छोटे बच्चे को पूरा चांद दिखा कर देखिए वो जिस तरह उछलता है, वो जिस तरह उत्साहित होता है उससे ये बात ज़ाहिर हो जाती है कि चांद के साथ हमारा वाकई में कोई अलग तरह का कनेक्शन है.

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या हो सकता है हम चाह कर भी कभी चांद को उपग्रह की तरह देख ही नहीं पाए हैं, हमारे लिए वो हमेशा से ही वो उस साथी की तरह रहा है जो उस वक्त हमारे साथ होता है जब दुनिया नहीं होती है. आम इंसानों ने कभी भी चांद के भीतर कोई खनिज तलाशने की नहीं सोची, उसने उसके अंदर हमेशा अपनत्व तलाशा. चांद हमारे लिए ठीक वैसा ही है जैसा ‘कास्ट अवे’ में समुद्र में अंजान द्वीप पर फंसे नायक के लिए एक फुटबॉल थी जिसके नाक-मुंह बनाकर वो घंटो उससे बात करता है. वो फुटबॉल उसे अकेला होने का अहसास नहीं होने देती.

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