#HumanStory: इस महिला ने गुजरात के गांवों में बनाए 87 तालाब - AcchiNews.com अच्छी न्यूज़ डॉट कॉम

AcchiNews.Com अच्छी न्यूज़ डॉट कॉम is Hindi Motivational Inspirational quotes site here you can find all positive khabar in hindi.

Earn Money

#HumanStory: इस महिला ने गुजरात के गांवों में बनाए 87 तालाब

Mi सेल लगी मात्र 1 रुपये में कई प्रोडक्ट आपके हो सकते हैं अभी अप्लाई करो www.saleoffer.online Or पाइये paytm 1000 रुपये रिचार्ज आफर https://ift.tt/2OqCzSo
गुजरात के सूखाग्रस्त जिलों में पानी सहेजने का काम कर रही मित्तल पटेल का एक ही मकसद है- हर गांव में तालाब बनवाना. पढ़ें, मित्तल की कहानी.

लगभग ढाई साल पहले बनासकांठा के एक गांव पहुंची. एक चीज आज भी बखूबी याद है. चारों ओर सूखा पड़ा था लेकिन खेतों में भरपूर पानी था. हर किसान ने अपना-अपना बोरवेल किया हुआ था. जितने पैसे, जमीन में उतना ही गहरा बोरवेल. एक किसान ने 13 सौ फीट नीचे पाइप डलवा रखा था. मैंने समझाना चाहा कि बोरवेल स्थायी हल नहीं. ऐसे तो जमीन का पानी एक रोज खत्म हो जाएगा. सुननेवालों पर कोई असर नहीं हुआ. फिर मैंने आने वाली पीढ़ियों का हवाला दिया कि सारा पानी हम इस्तेमाल कर लेंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ियां क्या करेंगी! इसका थोड़ा असर तो हुआ लेकिन तब भी कोई सोचने को तैयार नहीं दिखा.

मैंने आखिरी दांव खेला. मैंने कहा- क्यों न हम आपके गांव में तालाब खुदवा दें! तमाम गांव हंसने लगा. उन्हें लगा कि शहर की पढ़ी-लिखी होकर भी मैं 'मॉर्डन' नहीं हो सकी. सुननेवालों को मेरी बातों में दिलचस्पी तो थी लेकिन सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें मेरी बातें अजीब लग रही थीं. लोग उल्टा मुझे समझाने लगे कि आज के जमाने में तालाब कौन करता है. मैं वापस लौट आई. कुछ वक्त बाद दोबारा उसी गांव पहुंची. फिर गई. ऐसे 8-10 फेरों, पूरा-पूरा दिन लगाने और कई तरह के वीडियो दिखाने के बाद वे राजी हुए. वे अब तालाब खुदवाने को तैयार तो थे लेकिन ये हमारी जीत नहीं थी.



लोगों के दिमाग में बहुत गहरे ये बात थी कि तालाब खुदवाना और उसे ‘मेटेंन’ रखना सरकारी काम है. वे किसी भी तरह से तालाब में योगदान देने को तैयार नहीं थे. गांववालों ने पैसे लगाने से साफ इन्कार कर दिया. मैंने कहा- हम जेसीबी लगाएंगे. मिट्टी निकालेंगे लेकिन मिट्टी हटाने के लिए ट्रक आपको देनी होगी. वे एक रुपया लगाने को तैयार नहीं थे. फिर हमने कहा- ट्रैक्टर भी हम लगा देंगे. आपको बस इतना करना है कि काम करने वालों के लिए खाने का इंतजाम करना होगा. उन्होंने इसके लिए भी मना कर दिया. अब हमें तरीका बदलने की जरूरत थी.

फिर तो वो पूरा साल तब हमने गांवों में घूमने और लोगों को समझने-समझाने में लगाया. साल खत्म होते-होते कई गांववाले हमारा साथ देने को राजी हो चुके थे. अब नई मुश्किल ये थी कि गांवों में तालाब तो थे लेकिन पूरी तरह से भरे हुए. तालाबों को मिट्टी से पाटकर उनपर खेती की जा रही थी. कई लोगों ने तालाब की जमीन पर घर बना रखा था. उन्हें जमीन से हटाना एक अलग लड़ाई थी. सरपंचों से कहते तो वे उल्टा मुझपर डाल देते. आपको तालाब बनवाना है तो आप उन्हें वहां से हटाइये. फिर नए सिरे से काम किया. अगर ऐसे लोग गरीब थे तो उन्हें पंचायत की जमीन दिलवाई गई और तालाब खाली करवाया गया.

एक औसत चौड़ाई-गहराई का तालाब बनने में लगभग 20 दिन लगते हैं. यहां एक-एक तालाब के लिए हमें महीनों का इंतजार करना पड़ा. तब जाकर काम शुरू हुआ.

Loading...


जिन गांवों में तालाब खुदाई चलती है, वहां मैं खुद रहती हूं. जेसीबी से मिट्टी निकाली जाती है, ट्रैक्टर से हटाई जाती है. कई-कई गांवों में आधे काम के बाद लोग थकने लगे. उन्हें लगा कि हां बोलकर वे फंस गए. एक किसान ने बोरवेल की तरफ इशारा करते हुए पूछा- आखिर इसमें क्या खराबी है? मेरा जवाब था- खराबी कुछ नहीं, सिवाय इसके कि आपके बच्चों के पास ये भी नहीं होगा. पैसों से जमीन के भीतर का खत्म पानी लौटाया नहीं जा सकता.

गांवों में काम के दौरान कितने ही किस्से-कहानियां सुनती हूं. एक बार एक सरपंच ने अपनी कहानी बांटी. वो जब बच्चे थे तो गांव में तालाब पानी से लबालब थे. उन्हें आज भी याद है कि साल का एक दिन ऐसा होता है, जब पूरा गांव 'तालाब-सेवा' करता था. मजदूर मजदूरी पर नहीं जाता था. किसान खेती नहीं करते थे. गृहणियां घर के काम जल्दी निपटा देती थीं. तमाम गांव टुकड़े बनाकर एक-एक तालाब पर इकट्ठा होता और उसकी साफ-सफाई करता था.

साल का वो एक दिन त्यौहार जैसा लगता था. अपने बचपन का ये किस्सा सुनाते हुए सरपंच की आवाज में मलाल था.

हमारे पुरखे लंबा सोचते थे. बारिश के पानी को इकट्ठा करने के लिए गांव-गांव में तालाब हुआ करते. वे एक-दूसरे से जुड़े हुए थे. एक तालाब का पानी ओवरफ्लो हो जाए तो दूसरे से तीसरे में पहुंच जाया करता. अब के लोग सोचते हैं - पानी कम हो रहा है तो जमीन कुछ और फुट गहरे खोद देते हैं. यही वजह है कि पहले 40 फुट खोदने पर पानी का सोता मिल जाता था, वहीं अब डेढ़ सौ फुट गहरे जाने पर भी सूखा मिलता है.

फील्ड विजिट के दौरान कई गांव ऐसे भी मिले जहां दलित समुदाय गांव के बाहर रह रहा था. उनके पास जमीन का पट्टा नहीं था. हमने काम शुरू किया तो शर्त रखी कि उन्हें जमीन मिले. कई गांवों में भयंकर गरीबी दिखी. वहां भी तालाब खुदवाने के दौरान हमने गांव का योगदान मांगा. मैंने कहा- पूरे गांव में 25 ऐसे लोग तो होंगे, जिनके पास थोड़ा-बहुत पैसा हो. वही लोग जितना मुमकिन हो, पैसे जमा करें और ट्रैक्टर में लगाएं. ऐसा करना जरूरी है. तालाब में उनकी भागीदारी रहेगी तो उसकी कद्र भी होगी.

कई साल पहले ही बनासकांठा जिला डार्क जोन डिक्लेयर हो गया. यानी यहां जमीन में पानी का स्तर इतना कम हो चुका है कि ट्यूबवेल खुदाई पर रोक लग गई.

खतरे की इस घंटी के बाद भी यहां के बाशिंदे निश्चिंत रहे. बोरवेल करवाते रहे. अब जाकर लोग पानी को लेकर चेते हैं. जहां-जहां तालाब खुदवाए गए हैं, गांववाले उसे भरने की कोशिश कर रहे हैं. कई गांवों में पंच-सरपंचों ने खुद पहल की और नर्मदा पाइपलाइन के जरिए तालाब भरवाए. बहुत सी जगहों पर तालाब बन तो चुके हैं लेकिन बारिश का इंतजार कर रहे हैं.

पहले मैं लोगों से तालाब बनवाने को बोलती थी. अब उन गांवों की लंबी लिस्ट है, जो अपने यहां तालाब खुदवाना चाहते हैं. लेकिन फिलहाल मुझे तालाब बनाने से ज्यादा चिंता बारिश की है. बारिश हो तो सूखे पड़े तालाब लहलहा जाएं.

और पढ़ने के लिए क्लिक करें-

#HumanStory: कहानी उस गांव की, जहां पानी के लिए मर्द करते हैं कई शादियां

#HumanStory: क्या होता है जेल की सलाखों के पीछे, रिटायर्ड जेल अधीक्षक की आपबीती

#HumanStory: सूखे ने मेरी बेटी की जान ले ली, सुसाइड नोट में लिखा- खेत मत बेचना 

#HumanStory: एक साथ 11 मौतों के बाद ये है 'बुराड़ी के उस घर' का हाल, मुफ्त में रहने से भी डरते हैं लोग

(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए human story news18 टाइप करें.)