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5 साल में हर चौथे दिन एक नाबालिग की ख़ुदकुशी, इसलिए चौंकिए!

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ताज़ा सरकारी डेटा कह रहा है कि देश की राजधानी (National Capital) में हर चार दिन में कोई न कोई बच्चा या नाबालिग खुदकुशी (Suicide) कर रहा है. विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अस्ल तस्वीर, सरकारी आंकड़ों से भी ज़्यादा खराब हो सकती है. ये आंकड़े एक आरटीआई आवेदन (RTI Plea) के जवाब में सामने आने पर कई सरकारी विभागों को जवाब देने में मुश्किल भी हो रही है लेकिन चिंता का विषय यह है कि हालात इतने बिगड़ कैसे गए और अब क्या किया जाना चाहिए या क्या किया जा रहा है. विस्तार से जानें के बच्चों ने किन कारणों के चलते आत्महत्या जैसा कदम उठाया, इन आंकड़ों को किए नज़रिए से समझा जाए.

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28 जून 2018 की घटना थी, जब अंजलि गुप्ता की 9 वर्षीय बेटी पिंकी ने घर में पंखे से लटककर आत्महत्या की थी. दक्षिण ज़िला पुलिस (South District Police) ने इस केस में छानबीन की, लेकिन फिर ये केस दक्षिण पश्चिम ज़िला पुलिस के पास गया. उसके बावजूद इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि पिंकी ने खुदकुशी क्यों की. पुलिस ने इस बारे में और बात करने से भी इनकार कर दिया. अब हकीकत ये है कि अंजलि की बेटी का केस सिर्फ एक आंकड़ा बन गया है, जो पिछले पांच साल में दिल्ली में कम से कम 449 नाबालिगों की खुदकुशी (Minor Suicide Data) के डेटा में शामिल है.

दिल्ली के संदर्भ में, सरकारी स्तर से मिले ये आंकड़े बताते हैं कि द्वारका ज़िले में अवयस्कों की खुदकुशी के सबसे ज़्यादा 140 मामले आए हैं. 2014 से 18 के बीच के इस डेटा में ज़िक्र है कि दक्षिण दिल्ली में अवयस्कों की आत्महत्या के 70 केस दर्ज हुए. वहीं उत्तर पश्चिम दिल्ली में 87 तो दक्षिण पश्चिम दिल्ली में 68 केस पुलिस रिकॉर्ड में हैं.

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स्कूली परीक्षाओं का दबाव छात्रों की आत्महत्या का एक बड़ा कारण देखा गया.

क्या रहे खुदकुशी के कारण?

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ये डेटा दिल्ली के वकील गौरव बंसल की एक आरटीआई याचिका के बाद दिल्ली पुलिस ने जारी किया. बंसल ने सुप्रीम कोर्ट में भी एक याचिका दायर कर देश के हर राज्य व केंद्रशासित प्रदेश में आत्महत्या बचाव पुलिस सेल बनाए जाने की मांग की थी. बहरहाल, दिल्ली के इन आंकड़ों को देखा जाए तो बच्चों की आत्महत्या को लेकर कोई स्पष्ट कारण खुले तौर पर सामने नहीं आया है. स्कूली परीक्षाओं में खराब प्रदर्शन, दोस्तों के साथ रिश्तों में तनाव, परिवार में विवाद और प्रेमियों के साथ झगड़े मुख्य कारण बताए गए हैं.

हेल्थ इंडेक्स में भी नहीं था ज़िक्र!
'दिल्ली के कई ज़िलों ने इस मामले में रिस्पॉंस नहीं दिया, कुछ ने रिकॉर्ड मेंटेन नहीं किए तो कुछ ने साझा नहीं किए.' बंसल ने आवेदन पर मिले जवाब के मद्देनज़र ये भी कहा. वहीं, 2016 में, जब नीति आयोग ने वर्ल्ड बैंक के साथ मिलकर हेल्थ इंडेक्स रिपोर्ट जारी की थी, तो उसमें में मानसिक स्वास्थ्य के आंकड़ों को लेकर कहा गया था 'सालाना आधार पर क्वालिटी डेटा इस संदर्भ में मिला ही नहीं'. अब ये संकेत साफ है कि राजनीति, राज्य और अधिकारी आत्महत्याओं और मानसिक स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
आत्महत्या के दरों को लेकर जब उम्र के आधार पर एक अध्ययन किया गया तो पाया गया कि 15 से 29 साल की उम्र के बीच आत्महत्या की टेंडेंसी सबसे ज़्यादा होती है. शाहदरा स्थित ह्यूमन बिहेवियर एंड अलाइड साइंसेज़ के डॉ देसाई का कहना है '15 से 25 साल की उम्र के बीच सीज़ोफ्रेनिया या ध्रुवीय तनाव जैसे मनोवैज्ञानिक डिसॉर्डर होने की आशंका सबसे ज़्यादा देखी जाती है क्योंकि इसी उम्र के दौरान मनोवैज्ञानिक और सामाजिक बदलावों से मन जूझता है'.

किशोर ले रहे हैं हेल्पलाइन की मदद
पुणे बेस्ड एक एनजीओ की एक कार्यकर्ता ने बताया कि देश भर से किशोरों के कॉल्स ज़्यादा आते हैं. कई कारण होते हैं लेकिन परीक्षाओं के समय में इस उम्र के अवयस्कों के कॉल्स की संख्या बढ़ जाती है. अस्ल में, किशोरावस्था के साथ ही हार्मोनल परिवर्तन, परिवार, दोस्तों व अन्य सामाजिक वर्गों के साथ व्यवहार के दौरान कई तरह के मानसिक तनाव पैदा होते हैं, जो मानसिक रोगों को जन्म दे सकते हैं. दक्षिण ज़िले के डीसीपी विजय कुमार ने न्यूज़18 से बातचीत में कहा कि 'आत्महत्या के मामलों में कई कारण रहे लेकिन ज़्यादातर केसों में साफ तौर पर एक तनाव वजह था. भले ही उस तनाव के पीछे स्कूल रहा हो, प्रेमी या कोई निजी नाकामी'.

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विशेषज्ञों के मुताबिक देश का सामाजिक-आर्थिक ढांचा बदलने के साथ ही पर्सनैलिटी डिसॉर्डर के आंकड़े बढ़ रहे हैं.

देश बदल रहा है तो बढ़ रहे हैं डिसॉर्डर?
डॉ देसाई का कहना है कि सुसाइड के मामलों में एक बड़ा कारण आर्थिक स्थितियों से जुड़ा होता है. सामाजिक-आर्थिक विवेचना में किशारों की सुसाइड केसों का विश्लेषण किया जाए तो जानबूझकर खुद को नुकसान पहुंचाना यानी डीएसएच एक कॉमन धारणा के तौर पर देखा जाता है. उदाहरण के तौर पर नस काट लेना. विशेषज्ञों की मानें तो ये डीएसएच या इस तरह के कदम मदद चाहने के मनोविज्ञान के सूचक हैं. इसका साफ मतलब है कि देश का सामाजिक-आर्थिक ढांचा बदलने के साथ ही पर्सनैलिटी डिसॉर्डर के आंकड़े बढ़ रहे हैं.

विशेषज्ञ डॉक्टरों का यह भी कहना है कि यह कीमत होती ही है क्योंकि अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में पिछले दशकों में ऐसी टेंडेंसी देखी जा चुकी है. वहीं, दिल्ली के स्वास्थ्य सचिव संजीव खिरवाड़ का कहना है कि ऐसे में शैक्षणिक संस्थनों, स्वास्थ्य संस्थानों और पुलिस आदि सभी को मिल जुलकर एक रणनीति बनाकर आत्महत्या के खिलाफ लड़ने की ज़रूरत है.

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