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के. कामराज ऐसे बने पं. नेहरू के पसंदीदा, कांग्रेस में लागू हुआ उनका खास प्‍लान

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नई दिल्‍ली. जब-जब केंद्र सरकार (Central Government) की ओर से मंत्रिमंडल में बड़े फेरबदल किए जाते हैं और कैबिनेट (Cabinet) में शामिल लोगों को इस्‍तीफा दिलाकर संगठन (Organisation) में लाया जाता है, तो सियासी गलियारों में कांग्रेस के कद्दावर (Congress Stalwart) नेता भारत रत्‍न' कुमारस्‍वामी कामराज (Kumaraswami Kamaraj) की चर्चा आम हो जाती है. चीन के साथ 1962 में हुए युद्ध के बाद जब कांग्रेस की छवि कमजोर पड़ रही थी, तब के. कामराज तमिलनाडु (Tamil Nadu) के मुख्‍यमंत्री थे.

उन्‍होंने कांग्रेस को मजबूत करने के लिए 2 अक्‍टूबर, 1963 को मुख्‍यमंत्री पद से इस्‍तीफा दे दिया. इसके बाद उन्‍होंने तत्‍कालीन पीएम पंडित जवाहर लाल नेहरू (Pt. Jawaharlal Nehru) से तमिलनाडु का कांग्रेस अध्‍यक्ष बनाने की पेशकश की. पं. नेहरू को उनका विचार पसंद आया और उन्‍होंने इसे पूरे देश में लागू कर दिया. इसे ही कामराज प्‍लान कहा जाता है. लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस की हार के बाद भी कामराज प्‍लान की चर्चा आम हो गई थी.

छह केंद्रीय मंत्रियों और छह मुख्‍यमंत्रियों को देना पड़ा था इस्‍तीफा
कामराज प्‍लान के चलते तब छह कैबिनेट मंत्रियों (Cabinet Ministers) और छह मुख्यमंत्रियों (Chief Ministers) को इस्तीफा देना पड़ा था. कैबिनेट मंत्रियों में मोरारजी देसाई, लाल बहादुर शास्त्री, बाबू जगजीवन राम और एसके पाटिल जैसे लोग थे. वहीं, उत्तर प्रदेश (UP) के चंद्रभानु गुप्त, मध्‍य प्रदेश (MP) के मंडलोई, ओडिशा (Odisha) के बीजू पटनायक जैसे मुख्यमंत्रियों को भी इस्तीफा देना पड़ा था. इसके बाद इसी साल कामराज को कांग्रेस का राष्‍ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया.

उनका मानना था कि पार्टी के बड़े नेता सरकार में अपने पदों से इस्तीफा दें और अपनी ऊर्जा कांग्रेस पार्टी में नई जान फूंकने के लिए लगाएं. हालांकि, कुछ राजनीतिक विश्‍लेषकों का कहना है कि कामराज प्‍लान ने पं. नेहरू को अपनी नई टीम बनाने के लिए आजाद कर दिया था. कहा जाता है कि कामराज प्लान की बदौलत कुमारस्‍वामी केंद्र की राजनीति में इतने मजबूत हो गए कि नेहरू के निधन के बाद शास्त्री और इंदिरा गांधी को पीएम बनवाने में उनकी भूमिका किंगमेकर की रही. वह तीन बार कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे.

के. कामराज को अंग्रेजों ने छह बार जेल भेजा. उन्‍होंने करीब 3,000 दिन जेल में बिताए.

नमक आंदोलन में शामिल होकर पहली बार जेल गए कामराज

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भारत रत्‍न के. कामराज का जन्म 15 जुलाई 1903 को तमिलनाडु के विरदुनगर में एक व्यवसायी परिवार में हुआ था. उनका मूल नाम कामाक्षी कुमारस्वामी नाडेर था. बाद में वह के. कामराज के नाम से ही जाने गए. कामराज अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए. वह 15 साल की उम्र में जलियावाला बाग हत्याकांड के चलते स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े. महज 16 साल की उम्र में वह कांग्रेस में शामिल हो गए. वह 18 साल के थे, तब महात्‍मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी.

कामराज इस आंदोलन में शामिल हुए. 1930 में कामराज ने नमक आंदोलन में हिस्सा लिया और पहली बार जेल गए. इसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें छह बार जेल भेजा. उन्‍होंने करीब 3,000 दिन जेल में बिताए. उन्‍होंने जेल में रहकर ही पढ़ाई पूरी की और जेल में रहते ही म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के चेयरमैन चुने गए. हालांकि, जेल से बाहर आने के 9 महीने बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया. उनका कहना था कि आपको ऐसा कोई भी पद स्वीकार नहीं करना चाहिए, जिसके साथ आप न्याय नहीं कर सकते हैं.

तमिलनाडु के सीएम बने तो सूबे की साक्षरता दर 37 फीसदी तक पहुंचाई
दक्षिण भारत की राजनीति में कामराज को शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाना जाता है. आजादी के बाद 13 अप्रैल, 1954 को कामराज ने अनिच्छा से तमिलनाडु का मुख्यमंत्री पद स्वीकार किया. हालांकि, प्रदेश को एक ऐसा नेता मिल गया, जो उनके लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाने वाला था. कामराज लगातार तीन बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे.

उन्होंने प्रदेश की साक्षरता दर को 7 फीसदी से बढ़ाकर 37 फीसदी तक पहुंचा दिया. कामराज ने आजादी के बाद तमिलनाडु में जन्मी पीढ़ी के लिए बुनियादी संरचना पुख्ता की थी. उन्होंने व्यवस्था दी कि कोई भी गांव बिना प्राथमिक स्कूल के न रहे. उन्होंने निरक्षरता हटाने का प्रण किया और कक्षा 11वीं तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा लागू कर दी. वह स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए मिड-डे मील योजना लेकर आए. उन्हीं के कार्यकाल के बाद से तमिलनाडु में बच्चे तमिल में शिक्षा हासिल कर सके.

पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्‍त्री के निधन के बाद कामराज ने इंदिरा गांधी के पक्ष में लामबंदी की और वह कांग्रेस संसदीय दल में 355 सांसदों का समर्थन पाकर देश की तीसरी पीएम बन गईं.

'जिसे हिंदी-अंग्रेजी न आती हो, उसे इस देश का पीएम नहीं बनना चाहिए'
कामराज को आजाद भारत के पहले किंगमेकर के तौर पर भी माना जाता है. दो बार प्रधानमंत्री बनने का मौका मिलने के बावजूद उन्होंने यह पद नहीं लिया. पं. नेहरू की मौत के बाद 1964 में कांग्रेस नेतृत्व के संकट से जूझ रही थी. ऐसे में बतौर कांग्रेस अध्यक्ष कामराज ने लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर पहुंचाया.

लाल बहादुर शास्त्री की अचानक हुई मौत के बाद फिर से प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली हुई. तब भी कामराज के पास प्रधानमंत्री बनने का मौका था. इस बार सिंडीकेट ने भी कामराज के नाम का प्रस्ताव प्रधानमंत्री पद के लिए दिया, लेकिन उन्होंने इसके लिए साफ मना कर दिया. उन्होंने पश्चिम बंगाल के नेता अतुल्य घोष से कहा, 'जिसे ठीक से हिंदी और अंग्रेजी न आती हो, उसे इस देश का पीएम नहीं बनना चाहिए.' कामराज ने इंदिरा गांधी के पक्ष में लामबंदी की और वह कांग्रेस संसदीय दल में 355 सांसदों का समर्थन पाकर देश की तीसरी पीएम बन गईं.

इंदिरा गांधी के पीएम बनने के बाद कांग्रेस और सरकार में बढ़ते गए मतभेद
कामराज और उनके सहयोगियों को कांग्रेस के भीतर 'सिंडिकेट' के नाम से जाना जाता था. नेहरू की मौत के बाद पार्टी में 'सिंडिकेट' की ताकत बहुत बढ़ गई थी. इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कांग्रेस पार्टी में कामराज की पकड़ कमजोर करने का काम शुरू कर दिया. सिंडिकेट पार्टी चला रहा था और इंदिरा सरकार चला रही थीं. पार्टी और सरकार के बीच मतभेद इस स्तर पर पहुंच गए कि 1969 में औपचारिक रूप से पार्टी का विभाजन हो गया.

लोकसभा चुनाव, 1967 में कांग्रेस कई राज्यों में बुरी तरह हारी. लोकसभा में भी उसे महज 285 सीटें मिलीं. खुद कामराज तमिलनाडु में अपनी गृह विधानसभा विरदुनगर से चुनाव हार गए. इस बार इंदिरा गांधी ने कहा कि हारे हुए नेताओं को पद छोड़ना चाहिए. कामराज ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ दिया. हालांकि, नए कांग्रेस अध्यक्ष निजा लिंगाप्पा बने, लेकिन अंदरखाने संगठन के फैसले कामराज ही ले रहे थे. ऐसा लंबे समय तक चलने वाला नहीं था. संगठन और सरकार के बीच दूरी बढ़ती जा रही थी. वरिष्ठ नेता अपनी अनदेखी से नाराज़ थे.

गांधीवादी कामराज की 2 अक्टूबर, 1975 को गांधी जयंती के दिन हार्टअटैक से मौत हो गई.

कामराज को 1976 में मरणोपरांत भारत रत्न से किया गया सम्मानित
जाकिर हुसैन के बाद होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में संगठन ने आंध्र प्रदेश के नेता नीलम संजीव रेड्डी को प्रत्याशी घोषित किया तो इंदिरा ने उपराष्ट्रपति वीवी गिरि को पर्चा दाखिल करने को कहा. रेड्डी चुनाव हार गए और गिरि राष्ट्रपति बन गए. संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने नवंबर, 1969 में इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया और कांग्रेस संसदीय दल को नया नेता चुनने का आदेश दिया. संसदीय दल की बैठक में इंदिरा को 285 में 229 सांसदों का समर्थन मिला. बचे वोट उन्होंने तमिलनाडु में कामराज की धुर विरोधी डीएमके से जुटा लिए. लेफ्ट पार्टियां भी उनके साथ आ गईं.

हालांकि इस बाद कांग्रेस पार्टी कांग्रेस ओ (ऑर्गनाइजेशन) और इंदिरा की कांग्रेस (रूलिंग) में बंट गई और कामराज ने केंद्र की राजनीति छोड़ तमिलनाडु का रास्ता पकड़ लिया. 1971 में हुए लोकसभा चुनाव में कामराज तो जीत गए लेकिन संगठन के ज्यादातर नेता हार गए. इंदिरा की कांग्रेस को जनादेश मिला और कामराज की राजनीति का सूरज ढलना शुरू हो गया. गांधीवादी कामराज की 2 अक्टूबर, 1975 को गांधी जयंती के दिन हार्टअटैक से मौत हो गई. उन्हें 1976 में मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

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