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अंग्रेज जेलर को मारा था थप्पड़, पिता का नाम पूछने पर बताया था महात्मा गांधी!

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वैसे तो देश के ज्यादातर हिस्सों से गांधीजी (Mahatma Gandhi) का सीधा जुड़ाव रहा है. कभी किसी आंदोलन के दौरान शहर से गुजरना हुआ है तो कभी अंग्रेजों के किसी फरमान का विरोध करने के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा है. लेकिन कुछ शहर ऐसे भी हैं जहां गांधीजी कभी गए ही नहीं, लेकिन किस्से ऐसे-ऐसे हुए जो किताबों में दर्ज हो गए. ऐसा ही एक किस्सा यूपी (UP) के एटा (Etah) जिले की जेल से जुड़ा है. हालांकि इस किस्से को 88 बरस बीत चुके हैं, लेकिन आज भी बुजुर्ग बहादुरी का एहसास करते हुए इस किस्से को सुनाते हैं.

कौन थे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी नियाज़ अहमद ज़ुबैरी

एटा निवासी सुनील शर्मा के दादा गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित चंद्रभान तो आज जिंदा नहीं हैं. लेकिन सुनील शर्मा के शब्दों में उनका जीवन आज भी सुना जा सकता है. सुनील बताते हैं, “एटा जनपद के तेज तर्रार सवतन्त्रता संग्राम सेनानी नियाज़ अहमद ज़ुबैरी का नाम किसी परिचय का मोहताज नही है. स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में उनका देश में बहुत बड़ा योगदान रहा.

हमारे दादा बताते थे कि नियाज अहमद ज़ुबैरी जितने देश के प्रति समर्पित रहे उतने ही वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लगाव रखते थे. उस वक्त राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर नमक कानून तोड़ने के आंदोलन में नियाज अहमद ज़ुबैरी को एक वर्ष की कठोर कारावास की सजा हुई थी. जुबैरी अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन में सन 1942 ई. में भी 6 महीने जेल में रहे.”

एटा ज़िले के मारहरा कस्बे में यह वो मकान है जहां नियाज़ अहमद ज़ुबैरी रहा करते थे. (फोटो-मोहम्मद आमिल )

इस युवक ने बताया था पिता का नाम महात्मा गांधी

एटा निवासी रविंद गोयल के दादा शंकरलाल गोयल गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे.

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रविंद का कहना है दादा बताया करते थे कि “सन 1931 ई. में जब नियाज अहमद ज़ुबैरी एटा जेल में बंद थे उस वक़्त वहां एक ऐसी घटना घटित हुई जो एटा जनपद के लिए गंगा-जमुनी तहजीब का संगम बन गई. ज़ुबैरी किसी न किसी आंदोलन के चलते आए दिन जेल में जाते रहते थे. ऐसे ही एक आंदोलन के दौरान वह एटा जेल गए थे. एक दिन एक कैदी अपनी बैरक के बाहर गीता पढ़ रहा था. तभी वहां अंगेज जेलर आया. उसने गुस्से में आकर उस कैदी को ठोकर मार दी. यह बात वहां खड़े ज़ुबैरी को नागवार गुजरी. उन्होंने जेलर को थप्पड़ मार दिया.

इसके बाद जेलर के ऑफिस में उनकी पेशी हुई. तब तक जेलर को उनका नाम मालूम पड़ चुका था. लेकिन बातचीत के दौरान जेलर ने ज़ुबैरी से उनके पिता का नाम पूछा तो उन्होंने महात्मा गांधी बताया. जिस पर जेलर चौंक गया और यह बात दूसरे लोगों तक भी पहुंच गई. इसके बाद ज़ुबैरी को काल कोठरी की सजा सुनाई गई थी.”

वहीद अहमद ज़ुबैरी मारहरा, एटा के चेयरमैन हैं. नियाज़ अहमद ज़ुबैरी इनके दादा थे. (फोटो-मोहम्मद आमिल)

दंगे में साथी स्वतंत्रता सेनानी की ज़ुबैरी ने ऐसे बचाई थी जान 

मारहरा के चेयरमैन वहीद अहमद बताते हैं, “नियाज़ अहमद ज़ुबैरी का जन्म जनपद के एटा के एतिहासिक कस्बा मारहरा के नामचीन परिवार में हबीब अहमद ज़ुबैरी के घर 1898 ई. में हुआ था. नियाज अहमद ज़ुबैरी के भाई अजीज अहमद ज़ुबैरी वकील थे. पंडित जवाहरलाल नेहरू से उनकी दोस्ती थी. वह प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कैलाशनाथ काटजू के साथ मध्य प्रदेश जेल में रहे थे.

जब 1939 में मारहरा में साम्प्रदायिक दंगा भड़का था तो उस समय वह एटा जनपद के एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होतीलाल दास के साथ शान्ती समिति की मीटिंग के भाग लेने पहुंचे. वहां होतीलाल दास को बलवाइयों ने घेर लिया था. उस वक़्त तुरन्त ही नियाज अहमद ज़ुबैरी होतीलाल दास को अपने करीबी रिश्तेदार व तत्कालीन टाउन एरिया चेयरमैन व मजिस्ट्रेट खान बहादुर चौधरी मोहम्मद स्वालेह की कोठी पर लेकर पहुंचे, जिन्होंने उन्हें वहां अपने तहखाने में पनाह देकर उनकी जिंदगी बचाई. 1951 में ज़ुबैरी का इंतकाल हो गया था.”

(रिपोर्ट-मोहम्मद आमिल)

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