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हरियाणा में आसान नहीं है ताऊ देवीलाल का ये रिकॉर्ड तोड़ पाना!

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नई दिल्ली. हरियाणा में आज विधानसभा चुनाव (Haryana Assembly Results 2019) के नतीजे आने वाले हैं. थोड़ी देर में यह साफ हो जाएगा कि राज्य में मनोहर लाल खट्टर (ML Khattar) एक बार से बीजेपी (BJP) की सरकार बनाने में कामयाब होते हैं या फिर भूपिंदर सिंह हुड्डा (Bhupinder Singh Huda) की अगुवाई में कांग्रेस (Congress) जाट लैंड के सिंहासन पर दोबारा काबिज़ होगी. अब नतीजे जो आएं, लेकिन जाट लैंड के लिए एक बात तो जरूर कही जा सकती है कि यहां पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल का एक रिकॉर्ड तोड़ पाना मुश्किल है.

देश में आपातकाल (Emergency) लगाने वाली कांग्रेस नेता इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के खिलाफ जनवरी 1977 में चार राजनीतिक दलों जनसंघ, कांग्रेस (संगठन), सोशलिस्ट पार्टी (SP) और भारतीय लोक दल (BlD), विद्रोही कांग्रेसियों और कुछ और दलों ने मिलकर जनता पार्टी बनाई. जून 1977 में हरियाणा विधानसभा चुनाव हुए. पार्टी ने जनता में इंदिरा विरोधी लहर को भुनाया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) का सूपड़ा साफ हो गया. 1972 के चुनाव में 52 सीट जीतने वाली कांग्रेस सिर्फ 3 सीट पर सिमट चुकी थी. जनता पार्टी (Janata Party) ने यहां 90 में से रिकॉर्ड 75 सीटें जीतीं. उस वक्त यहां पर पार्टी के प्रतिनिधि थे चौधरी देवीलाल. यह रिकॉर्ड अब तक हुए 13 चुनावों में आज तक कोई नहीं तोड़ पाया है. लेकिन भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस बार 75 सीटों का ही लक्ष्य रखकर चुनाव मैदान में उतर रही है. बड़ा सवाल यह है कि क्या बीजेपी नया रिकॉर्ड कायम कर पाएगी?

इस वजह से 1977 का रिकॉर्ड तोड़ सकती है बीजेपी! 

हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार राकेश चौरासिया का कहना है कि बीजेपी इतने आत्मविश्वास से बड़ा लक्ष्य तय करके काम कर रही है तो इसकी वजह भी हैं. राजनीतिक ट्रेंड यह कहता है कि उसके पक्ष में माहौल है. यह सैनिकों का प्रदेश है और पार्टी ने आर्टिकल 370 हटाने का बड़ा काम किया है. पीएम नरेंद्र मोदी का इस प्रदेश से पुराना लगाव है और उनसे बड़ा फिलहाल कोई लीडर दिख नहीं रहा है. यह चुनाव पार्टी उन्हीं के नाम पर लड़ रही है. दूसरी ओर मुख्य विपक्षी पार्टियां कांग्रेस और इनेलो अभी घर के झगड़े से नहीं उबर पाईं हैं. किसी जिले में कांग्रेस का जिलाध्यक्ष तक नहीं है. ऐसे में बीजेपी चौधरी देवीलाल का रिकॉर्ड तोड़ भी सकती है और वो 50 सीट तक भी सिमटी रह सकती है. कांग्रेस ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा को एक-दो साल पहले यहां की कमान दी होती तो स्थितियां भिन्न हो सकती थीं. हालांकि, उनके आने से स्थितियां बदली हैं ऐसा कहा जा सकता है.

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हरियाणा में पीएम मोदी के नाम पर ही लड़ा जाएगा चुनाव!  (File Photo)

आपातकाल विरोधी आंदोलन के बड़े नेता थे चौ. देवीलाल

कैसे भूलें आपातकाल का दंश नामक किताब में डॉ. चंद्र त्रिखा लिखते हैं कि " चौधरी देवीलाल आपातकाल विरोधी आंदोलन के क्षेत्रीय आधार स्तंभों में से एक थे. प्रदेश जनसंघ के दिग्गज डॉ. मंगलसेन के साथ उनकी जोड़ी वैसे भी चर्चित रहती थी. डॉ. जय प्रकाश नारायण ने उन दिनों हरियाणा में दो स्थानों पर कुरुक्षेत्र व रोहतक में विशाल रैलियों को संबोधित किया था...इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित होने के तत्काल बाद जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में कांग्रेस (संगठन), भारतीय लोकदल,  जनसंघ, अकाली दल और सोशलिस्ट पार्टी सहित विपक्ष की नई दिल्ली में बैठक हुई जिसमें हरियाणा के प्रतिनिधि के रूप में चौधरी देवीलाल ने भाग लिया....1977 में हरियाणा विधानसभा के लिए चुनाव कराए गए और चौधरी देवीलाल मुख्यमंत्री बने."

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टिकट न मिलने पर बगावत की संभावना कम! आमतौर जब पार्टी की बहुत अच्छी स्थिति नहीं होती तो टिकट न मिलने पर दूसरे बड़े दावेदार बगावत कर देते हैं. लेकिन अभी बीजेपी की स्थिति ऐसी नहीं है. ज्यादातर लोगों को लग रहा है कि बीजेपी की सरकार दोबारा भी बन सकती है. ऐसे में टिकट वितरण से फैले असंतोष के बाद किसी लीडर के बगावत करने की संभावना कम दिख रही है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भितरघात हो सकती है बगावत नहीं. फिलहाल पार्टी ने सभी 90 सीटों पर तीन-तीन ऐसे दावेदारों का पैनल तैयार कर लिया है जो जताऊ हैं.

 कभी बीजेपी के 70 प्रत्याशियों की जमानत हो गई थी जब्त!

1991 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने हरियाणा में सिर्फ 2 सीटें जीती थीं. 70 सीटों पर उसके प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी. यानी कुल पड़े वैध वोट का छठा हिस्सा हासिल नहीं कर पाए थे. उसके पास टिकट लेने वालों का अकाल होता था. उस पार्टी में आज दूसरी पार्टियों के 11 वर्तमान विधायक इसलिए शामिल हो चुके हैं ताकि उनका राजनीतिक वजूद कायम रहे. बीजेपी प्रवक्ता राजीव जेटली का कहना है कि पार्टी ने जनता के लिए काम किए हैं. इसलिए जनता हमारे साथ है. हम लोग पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम मनोहरलाल खट्टर के नेतृत्व में 75 से अधिक सीटें जीतकर आएंगे.

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बीजेपी के बढ़ते जनाधार की वजह से दूसरी पार्टियों के 11 विधायक हो चुके हैं इसमें शामिल (File Photo)

पार्टी ने इसलिए रखा इतना बड़ा टारगेट

इस समय प्रदेश की 48 सीटें बीजेपी के पास हैं. जबकि लोकसभा की सभी 10 सीटें भी भाजपा की ही झोली में हैं. लोकसभा चुनाव का विधानसभावार विश्लेषण करने पर पता चलता है कि 89 सीटों पर बीजेपी अन्य पार्टियों से आगे थी. साफ है कि पार्टी ने 75 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य यूं ही नहीं लिया.

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