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नोबेल विजेता बनर्जी की अब्दुल लतीफ जमील लैब ने भारत में क्या झंडे गाड़े?

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अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी, उनकी पत्नी एस्थर डफलो (Esther Duflo) और उनके साथी अर्थशास्त्री माइकल क्रेमर (Michael Kremer) को अर्थशास्त्र के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize 2019) से नवाज़े जाने की घोषणा के बाद आपको जानना चाहिए कि किस तरह के कारनामे के लिए यह पुरस्कार दिया गया है. बनर्जी ने साल 2003 में पावर्टी एक्शन लैब (Poverty Action Lab) बनाई थी, जिसने दुनिया में गरीबी के मोर्चे पर जंग छेड़ी. अब जानने लायक ये है कि इस लैब का मकसद क्या है, इसने कैसे काम किया, 15 सालों में क्या हासिल किया और दुनिया के साथ ही भारत में इस संस्था ने क्या कारनामे किए?

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सरकारों, एनजीओ (NGOs), दानदाताओं और रिसर्चरों के साथ मिलकर काम करने वाली इस संस्था को 2005 में जब सऊदी अरब (Saudi Arabia) के एक उद्योग घराने की सामाजिक संस्था कम्युनिटी जमील ने फंड जारी किया, तब बनर्जी की इस लैब का नाम शेख अब्दुल लतीफ जमील (Abdul Latif Jameel) की स्मृति में रखा गया और कम्युनिटी जमील ने लगातार इस लैब के लिए और ज़्यादा फंडिंग (Funding) का रास्ता बनाया. इस जमील ग्रुप के बारे में भी आपको बताएंगे लेकिन पहले लैब के बारे में ज़रूरी बातें जानिए.

40 करोड़ गरीबों की हालत सुधरी!

बनर्जी की इस लैब को जे-पल (J-PAL) के नाम से जाना ​जाता है, जिसकी 2018 की सालाना रिपोर्ट में दावा किया गया कि लैब की रिसर्च के आधार पर दुनिया भर में जो कार्यक्रम चलाए गए, उनके बेहतर स्केल पर 40 करोड़ से ज़्यादा लोग पहुंचे. यह लैब दुनिया के गरीब और विकासशील क्षेत्रों में ज़्यादातर काम करती है. अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया के साथ ही उत्तर अमेरिका और यूरोप में भी इस संस्था का विस्तार है.

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भारत समेत दक्षिण एशिया के कई देशों में जे पल शिक्षा, स्वास्थ्य, अपराध, लैंगिक समानता, गरीबी और श्रम जैसे कई मोर्चों पर रिसर्च कार्यक्रम करता है.

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कैसे काम करती है लैब?
बनर्जी और डफलो के निर्देशन में इस लैब की बड़ी टीम मुख्य रूप से तीन तरह के काम करती है, प्रभावी मूल्यांकन, नीति निर्माण और क्षमता विकास. सामान्य शब्दों में इसका मतलब ये है कि गरीबी के कारणों और स्तरों को लेकर रिसर्च की जाती है, फिर उसे बेहतर बनाने के लिए नीति के स्तर पर काम किया जाता है और जिन्हें लाभ पहुंचाना है और जिसके ज़रिए पहुंचाना है, उन दोनों वर्गों की क्षमताएं बढ़ाने के लिए गतिविधियां की जाती हैं.
भारत में क्या हुआ हासिल?
जे-पल ने ज़्यादा उपलब्धियां अफ्रीका के देशों में गरीबी से लड़ने के मोर्चे पर हासिल की हैं, लेकिन भारत में भी इस लैब ने कुछ महत्वपूर्ण और कारगर काम किए हैं. लैब और द हिंदू की एक रिपोर्ट के हवाले से बताया जाता है कि भारत में इस संस्था ने कुछ बड़ी योजनाओं में भूमिका निभाई.

आंध्र प्रदेश में मनेरगा के लाभार्थियों के लिए एपी स्मार्टकार्ड से जुड़ी रिसर्च और अध्ययन. हरियाणा के स्कूलों में छात्रों की कक्षा नहीं बल्कि उनके वास्तविक लर्निंग स्तर पर अध्यापन को लेकर प्रयोग. बिहार के 12 ज़िलों में मनरेगा के नए सिस्टम के बाद बढ़े भ्रष्टाचार और भुगतान में लेटलतीफी को लेकर अध्ययन. इनके अलावा गुजरात में प्रदूषण, दिल्ली में स्वास्थ्य और राजस्थान में पुलिस विभाग से जुड़े कुछ प्रोजेक्ट्स पर इस लैब ने रिसर्च और प्रयोगों को अंजाम देकर कुछ बेहतर नतीजे हासिल करने में मदद की.

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दिल्ली में बच्चों के स्वास्थ्य के एक प्रोजेक्ट पर जे पल ने एक रिसर्च की थी.

किसने कैसे की तारीफ?
लैब के कामों को लेकर दुनिया भर में समय समय पर चर्चा होती रही है. बिल गेट्स ने लिखा था 'मेरे लिए, यह जानना बड़ी बात है कि जे-पल वैज्ञानिक आधार को लेकर समझ बना रही है, जिससे गरीबी के खिलाफ बेहतर ढंग से लड़ा जा सकता है'. इसके अलावा 2010 में बिज़नेस वीक ने इस लैब के कामों पर एक रिपोर्ट छापी जिसका शीर्षक था 'व्यावहारिक विद्रोही'. पुलित्ज़र विजेता पत्रकार निकोलस क्रिस्टॉफ ने लैब को 'मूल्यांकन में क्रांतिकारी' करार देकर कहा था 'वैश्विक विकास के लिए व्यावहारिक अर्थशास्त्र को अपनाने की यह पद्धति बेजोड़ है'.

क्यों अब्दुल लतीफ जमील को समर्पित हुआ नाम?
आखिर में ये भी जानें कि पावर्टी एक्शन लैब का नाम कम्युनिटी जमील से जुड़ने के बाद सऊदी अरब के मशहूर उद्योगपति अब्दुल लतीफ जमील के नाम पर इसलिए रखा गया क्योंकि वह सऊदी के बड़े कारोबारी ही नहीं बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता भी थे. उन्होंने कई समुदायों की बेहतरी के लिए स्वास्थ्य, फाइनेंस, शिक्षा आदि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण काम किए थे. उनके बेटे मोहम्मद अब्दुल लतीफ जमील ने समाज कल्याण के लिए ही कम्युनिटी जमील संस्था स्थापित कर दुनिया की कई ऐसी संस्थाओं के लिए फंडिंग के रास्ते खोले.

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