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जब गांधीजी सिगरेट पीने से ग्लानि से भर उठे और आत्महत्या की कोशिश की

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महात्मा गांधी  (Mahatma Gandhi) जब किशोर थे, तब वो अजीबोगरीब कुंठाओं से घिरे रहते थे. कमजोर और दब्बू भी थे.  कई बार उन्होंने जाने-अनजाने में ऐसी हरकतें की इससे खुद अपराधबोध से ग्रस्त हो गए. किशोर उम्र में एक समय ऐसा था, जब उनकी सोहबत सही नहीं थी, जिसमें उन्होंने कई गलत काम भी किए.

दरअसल महात्मा गांधी के आत्महत्या का मामला अचानक इसलिए सुर्खियों में आ गया है, क्योंकि गुजरात में नौवीं क्लास की एक परीक्षा में एक सवाल पूछा गया कि गांधीजी ने आत्महत्या कैसे की थी. हालांकि गांधीजी ने ऐसा कभी नहीं किया था लेकिन उनके दिमाग में ऐसा खयाल बचपन में एक बार जरूर आया था और उन्होंने इसके लिए खुद को मानसिक तौर पर तैयार किया लेकिन फिर अपने कदम पीछे खींच लिये.

गांधीजी को तब मोहनदास (Mohandas Karamchand Gandhi)के रूप में जाना जाता था. उन्होंने अपनी आत्मकथा में इन कामों को स्वीकार किया. गांधी के जीवनी लेखकों ने भी इस पर लिखा.

किशोर मोहनदास ने तब चोरी की. सिगरेट पी. आत्महत्या करने के बारे में सोचा. एक दिन वो वेश्या के कोठे पर भी पहुंच गए. पोरबंदर और राजकोट में वो दिन उनके लिए अजीब से ही थे.

मेहताब से दोस्ती और अजीबोगरीब प्रयोग
स्कूल के दिनों में मोहनदास की दोस्ती और जान-पहचान नहीं के बराबर थी. दब्बू होने के कारण वो किसी से बात नहीं कर पाते थे. परिवार में ही इतने हमउम्र थे कि उनका समय ज्यादातर उन्हीं के बीच गुजरता था.

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परिवार के बाहर पहली बार उनका जो दोस्त बना, उसका नाम शेख मेहताब था. उससे भी उनकी जान पहचान इसलिए हो पाई, क्योंकि वो उनके बड़े भाई कर्णवदास का मित्र था. शेख मेहताब निडर और साहसी था.

मोहनदास गांधी अपने इस मुसलमान मित्र की निडरता औऱ ताकत से प्रभावित थे. उसके जैसा बनना चाहते थे.

किशोर गांधी ने अपने दोस्त के साथ मिलकर अजीबोगरीब काम किए, जिसने उन्हें ग्लानि से भर दिया

मेहताब ने उन्हें बताया कि मांस खाने से वो अपनी ताकत बढ़ा सकते हैं. गांधीजी का परिवार विशुद्ध शाकाहारी परिवार था. मांस खाने की बात तो दूर रही, उसके बारे में बात करना भी पाप था. लेकिन गांधीजी उसकी बातों से इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने मांस खाने की कोशिश की ताकि ताकत बढाई जा सके, लेकिन वो अपने इस प्रयोग में बुरी तरह विफल रहे.

प्रयोग कोठे पर जाने का
फिर मेहताब ने मोहनदास पर दबाव डाला कि उन्हें अपना पुरुषत्व देखने के लिए वेश्यालय चलना चाहिए. उसने आश्वस्त किया कि इसमें कोई बुराई नहीं है. बल्कि इस प्रयोग के बाद वह खुद को गजब का पुरुष महसूस करने लगेंगे.

समस्या ये हुई कि गांधीजी के पास पैसा नहीं था. पैसा मेहताब की जेब से निकला. दोनों साथ में कोठे पर पहुंचे. वहां मेहताब किसी वेश्या के साथ अलग कमरे में चला गया. किशोर गांधी को एक अन्य महिला के हवाले कर दिया.

किशोर गांधी का व्यक्तित्व महात्मा गांधी से एकदम अलग था

थर थर कांप रहे थे गांधी
मोहनदास कोठे में महिला के साथ कमरे में चले तो गए. उस एकांत ने उनके होश उड़ा दिए. वह एक कोने में सहमे बैठे रहे.

एकाध बार जब उस महिला ने उन्हें हाथ लगाया तो वह थर-थर कांपने लगे. थोड़ी देर तक जब यही स्थिति बनी रही तो वो महिला ऊब गई. उसने धक्का देकर उन्हें कमरे से बाहर निकाल दिया.

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अपराधबोध और बढ़ गया
मोहनदास यकीनन उस प्रयोग से सकुशल बच गए. लेकिन कोठे पर जाने के इस कदम ने उनके अपराध बोधों में एक और वृद्धि हो गई.

अब उन्हें लगने लगा कि उन्होंने वेश्यालय जाकर अपने पुरुषत्व को चोट पहुंचाई है. चूंकि ये कदम उन्होंने कस्तूरबा से शादी के बाद उठाया था, लिहाजा वह ज्यादा ग्लानि से भी भर उठे थे. कस्तूरबा से हालांकि ये बात उन्होंने कभी नहीं बताई. लेकिन उन्हें लगने लगा कि मेहताब की बातों में आकर वो गलतियां कर रहे हैं. उन्होंने खुद को फिर उससे दूर कर लिया.

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किशोरवय में गांधीजी को सिगरेट पीने की लत लगी, जिसके लिए उन्होंने पैसे भी चुराए

चोरी कर सिगरेट पीते थे
मेहताब की दोस्ती से पहले मोहनदास जब हाईस्कूल में थे तो उन्हें सिगरेट पीने की लत लग गई. अपने चचेरे भाई के साथ मिलकर वह खूब सिगरेट पीते थे, जिन्हें वो दोनों अपने चाचा के यहां से चुराते थे.

जब सिगरेट खत्म हो जाती तो हरी सब्जियों के पत्तों की सिगरेट बनाकर पी लेते. कभी कभी नौकरों के पैसे चुराकर असली सिगरेट खरीद लाते.

नौकरों के यहां जब ज्यादा चोरियां होने लगीं तो दोनों अपराधबोध से भर गए. उन्होंने अपराध स्वीकार तो नहीं किया बल्कि अपराध से छुटकारे के लिए आत्महत्या करने का फैसला किया.

जब आत्महत्या करने निकले
दोनों आत्महत्या करने जंगल गए. धतूरा ढूंढने लगे. उस समय माना जाता था कि धतूरा खाने पर मौत हो जाती है. धतूरा मिलने के बाद वो दोनों एक मंदिर गए. मृत्यु से पहले के संस्कार पूरे किए.

उसके बाद एक सुनसान स्थान पर धतूरे के बीज खाए. लेकिन जब कुछ नहीं हुआ तो आगे के कदम पर बहस करने लगे. वो सोच रहे थे कि अगर धतूरे से भी नहीं मरे तो आगे क्या करेंगे.

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गांधीजी ने धतूरा खाकर अपने भाई के साथ आत्महत्या की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो पाए(तस्वीर : getty)

अगला सवाल मन में आया- क्या आत्महत्या करनी बहुत जरूरी है. इस सवाल पर गंभीरता से विचार करने के बाद दोनों मंदिर में पूजा कर घर लौट आए.

तब जीवित रहने के लिए मोहनदास के पास एक और महत्वपूर्ण कारण था. कुछ ही समय में उनका विवाह होने वाला था.

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