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बेटियों की पढ़ाई न छूटे, इसलिए फारुख ने खरीदकर दे दिया ई-रिक्शा

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नई दिल्ली. बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, ( Beti Bachao-Beti Padhao) सही मायने में इस एक नारे का असली मतलब तो फारुख ने ही समझा है. तभी तो वो किसी भी कीमत पर ऊंची तालीम (Education) की ओर बढ़ रहीं अपनी तीन बेटियों (Daughter) की पढ़ाई को रुकने नहीं देना चाहता. घर से स्कूल (School)  दूर था,  उसने बेटियों की तालीम जारी रखने के लिए ई-रिक्शा (e-rickshaw) खरीद दिया, ताकि वे उससे स्कूल जा सकें. उसकी एक बेटी शमां ने उसे चलाना सीख लिया और काम आसान हो गया. अब वो ई-रिक्शे में गांव की लड़कियों को लेकर निकल पड़ती है स्कूल. फारुख मजदूरी करके अपना घर चलाते हैं लेकिन अब बेटियों की शिक्षा को लेकर उनके हौसले को क्षेत्र के लोग सलाम कर रहे हैं.

फारुख की पत्नी इस चिंता में रहती थी कि स्कूल घर से दूर है, रास्ते में कोई अनहोनी न हो जाए, बस से आने-जाने का खर्च और बेटियों का दर्द दोनों एक साथ परेशान कर रहे थे. तभी फारुख ने यह तरकीब निकाल ली. गांवों मेंं खासतौर पर मुस्लिम कम्युनिटी में बेटियों की पढ़ाई-लिखाई को लेकर इतनी ललक कम ही देखने को मिलती है.  फारुख से उसकी बेटी शमां कहती रहती थी कि अब्बू पढ़ने-लिखने का वक्त आने-जाने में खर्च हुआ जा रहा है. लेकिन अब यह समस्या हल हो गई है. फारुख की यह कोशिश उस सोच को भी आईना दिखाती है जो कहती है कि “बेटियों को पढ़ाने से क्या फायदा?

कौन है फारुख और ई-रिक्शा से स्कूल जाने वाली उसकी बेटियां

यूपी के रामपुर ज़िले में एक जगह है टांडा. फारुख टांडा क्षेत्र में पड़ने वाले सैंताखेड़ा गांव का रहने वाला है. न्यूज18 हिन्दी ने जब फारुख से बात की तो उन्होंने बताया, “मेरी पांच बेटियां और एक सबसे छोटा बेटा है. मैं कभी खेत में तो कभी बाजार में मजदूरी कर लेता हूं.

बेटियों की पढ़ाई के लिए और ज्यादा से ज्यादा पैसा कमा सकूं इसके लिए मैं दिल्ली में भी काम करने गया था. लेकिन वहां काम मिला नहीं. अब कुछ दिन से मैं टांडा में ही मजदूरी करके 200 से 250 रुपये रोज कमा रहा हूं. मेरी दो बेटी शमा और मंतशा परवीन हाईस्कूल में पढ़ती हैं तो तीसरे नम्बर की जैबुनिंशा 8वीं क्लास में पढ़ रही है. सबसे छोटी दो बेटियां मदरसे में पढ़ने जाती हैं.”

बेटियों को इसलिए दिलाया ई-रिक्शा

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फारुख बताते हैं, “जब बेटियां बड़ी होने लगीं और बड़ी क्लास में आने लगीं तो मुझे इस बात का इल्म था कि अब एक बात जरूर उठेगी कि बड़ी-बड़ी बेटियों को अकेले इतनी दूर स्कूल में भेजते हो कोई अनहोनी हो गई तो? दूसरा बेटियां भी शिकायत करने लगीं थी कि हमारा आने-जाने में बहुत वक्त लग जाता है. ऊपर से पत्नी भी बस के खर्चे को लेकर फिक्रमंद थीं. जैसे ही यह सब दिमाग में आया तो ई-रिक्शा दिला दिया.”

ई-रिक्शा के लिए ऐसे जमा किए 76 हजार रुपये

एक बाप अपनी बेटी के लिए स्कूटी खरीदता है, साइिकल खरीदता है तो फिर ऐसे में स्कूल आने-जाने के लिए ई-रिक्शा क्यों. इस सवाल के जवाब में फारुख का कहना है, “गांव से स्कूल की दूरी 9 किमी है. बस से जाने के लिए गांव से एक किमी दूर आना पड़ता था. तीनों बेटियों को एक साथ स्कूल आना-जाना था जिससे उनकी सुरक्षा भी बनी रहे. और पैसा भी ज्यादा खर्च नहीं करना था.

सही बात तो यह थी कि पैसा हमारे पास ज्यादा था भी नहीं. बीवी ने घर में मौजूद एक भैंस का दूध बेचकर कुछ पैसे जमा किए थे वो निकाल लिए. कुछ पैसा बच्चियों ने दिया. इस तरह से जोड़-तोड़कर 76 हजार रुपये का ई-रिक्शा खरीद लाया. स्कूटी इसलिए नहीं खरीदी कि उसके लिए रोजाना पेट्रोल की जरूरत पड़ेगी. आए दिन मैकेनिक के पास ठीक कराने के लिए भी जाना पड़ेगा.”

ऐसे निकल रहा है ई-रिक्शा का खर्च

फारुख की बड़ी बेटी शमा बताती है, ई-रिक्शा की बैटरी चॉर्ज करने के लिए बिजली खर्च होती है. कभी-कभी रिक्शा में भी काम कराना होता है, इसलिए हम तीनों बहनों सहित गांव की दूसरी 5 लड़कियां भी स्कूल जाती हैं. वो पांचों मिलकर ई-रिक्शा का खर्च उठा लेती हैं.

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