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राष्ट्रपति शासन के बाद अब महाराष्ट्र के सामने क्या है विकल्प

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महाराष्ट्र (Maharashtra) में सरकार गठन नहीं होने की स्थिति में मंगलवार को राष्ट्रपति शासन (president rule) लगा दिया गया. राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी (Governor Bhagat Singh Koshyari) ने कहा कि चुनाव नतीजे आने के 15 दिनों बाद भी सरकार गठन का रास्ता साफ नहीं हो पाया था, इसलिए उन्होंने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी. हालांकि शिवसेना (Shiv Sena), एनसीपी (NCP) और कांग्रेस (Congress) अब भी सरकार बनाने के रास्ते तलाश रही है. तीनों पार्टियों के भीतर मंथन का दौर जारी है.

महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लग चुका है. राष्ट्रपति शासन के दौरान विधानसभा भंग रहती है. राज्य का शासन केंद्र द्वारा संचालित होता है. संविधान के आर्टिकल 356 के जरिए किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है. राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रीपरिषद की सिफारिश पर राष्ट्रपति शासन लगाने का ऐलान करते हैं. महाराष्ट्र में भी इसी प्रक्रिया का पालन किया गया है. इस दौरान महाराष्ट्र की विधानसभा भंग रहेगी. हालांकि नई विधानसभा गठित रहेगी.

ताजा हालात में राज्यपाल की भूमिका अहम

महाराष्ट्र में सरकार बनाने पर काम चल रहा है. अगर कोई पार्टी निर्धारित विधायकों के समर्थन की संख्या के साथ सरकार बनाने का दावा पेश करती है तो राज्यपाल अपने विवेक के अनुसार फैसला लेने को स्वतंत्र हैं. राष्ट्रपति शासन हटाने के लिए संसद से मंजूरी लेने की आवश्यकता नहीं है. ऐसे हालात में राजभवन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है.

अगर राज्यपाल को लगता है कि किसी पार्टी के पास निर्धारित विधायकों का समर्थन है और वो सरकार बनाने में सक्षम है, तो राज्यपाल उसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं.

maharashtra government formation after President s rule now what is the option before governor bhagat singh koshyari
महाराष्ट्र में सरकार गठन की अब भी संभावना तलाशी जा रही है

संविधान के अनुच्छेद 356 के मुताबिक किसी भी राज्य में अधिकतम 6 महीने तक के लिए ही राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है. इससे आगे की अवधि के लिए दोनों संदनों से मंजूरी लेनी होती है. इस तरह छह-छह महीने की अवधि को दोनों सदनों के अनुमोदन से तीन साल तक के लिए बढ़ाया जा सकता है.

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अभी के हालात में महाराष्ट्र में सरकार बनने के विकल्प खुले हैं. बीजेपी, शिवसेना, एनसीपी या कांग्रेस किसी भी वक्त राज्यपाल के सामने विधायकों का समर्थन पत्र देकर सरकार बनाने का दावा पेश कर सकते हैं. इसके बाद उन्हें विधानसभा में बहुमत साबित करना होगा. पहले भी कई राज्यों में पैदा हो चुके हैं ऐसा हालात

महाराष्ट्र में जो हालात पैदा हुए हैं, वो कोई पहली बार नहीं हुए हैं. चुनाव के बाद किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में ऐसे हालात बनते रहे हैं. बिहार में फरवरी 2005 में विधानसभा के चुनाव हुए थे. चुनाव नतीजों में किसी भी पार्टी को बहुमत हासिल नहीं हुआ. सरकार नहीं बनने की सूरत में राज्यपाल ने वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया.

बिहार में 7 मार्च 2005 को राष्ट्रपति शासन लगा था. ये लगातार 262 दिनों तक चला. 24 नवंबर 2005 को राष्ट्रपति शासन हटाया जा सका. उसके पहले अक्टूबर नवंबर में नए चुनाव हुए, जिसके बाद सरकार गठन का रास्ता साफ हुआ.

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एनसीपी सरकार गठन के लिए लंबी लंबी बैठकें कर रही है

कश्मीर में भी ऐसा हो चुका है. 2002 में जम्मू कश्मीर में ऐसे ही हालात में 15 दिनों के लिए राष्ट्रपति शासन लागू हुआ था. 2002 के जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. लेकिन वो बहुमत से दूर थी. सरकार गठन के लिए कांग्रेस और पीडीपी के बीच लंबी बातचीत चली.

दोनों पार्टियों के बीच समझौते के बाद राज्य में कांग्रेस-पीडीपी की सरकार बनी. पीडीपी प्रमुख मुफ्ती मोहम्मद सईद पहले तीन साल के लिए मुख्यमंत्री बने और इसके बाद आगे के तीन साल कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद मुख्यमंत्री रहे. इस गठबंधन में जम्मू कश्मीर की पैंथर्स पार्टी भी शामिल थी.

2002 में उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही हुआ था. 2002 के विधानसभा चुनाव नतीजों में किसी भी पार्टी को बहुमत हासिल नहीं हुआ था. इसके बाद 3 मार्च 2002 से लेकर 2 मई 2002 तक वहां 56 दिनों के लिए राष्ट्रपति शासन लागू रहा. बाद में बीएसपी और बीजेपी के बीच डील हुई.

बीजेपी ने बीएसपी सरकार का समर्थन किया और मायावती सूबे की मुख्यमंत्री बनीं. हालांकि ये सरकार भी एक साल से ज्यादा नहीं चल पाई. अगस्त 2003 में मायावती को इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद बीएसपी के बागियों की मदद से समाजवादी पार्टी की सरकार बनी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने.

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