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महाराष्ट्र में लटका पड़ा है सरकार बनाने का मामला, कई फैक्टर्स बन रहे हैं रोड़ा

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मुंबई. दो की लड़ाई में तीसरे की भलाई.....आपने अक्सर इस मुहावरे को राजनीति (Pollitics) में चरितार्थ होते देखा होगा. लेकिन इस बार महाराष्ट्र (Maharashtra) में दो की लड़ाई में तीसरी पार्टी अपनी भलाई नहीं देख रही है. जी हां हम बात कर रहे हैं कि शिवसेना (Shiv Sena) के कड़े तेवरों की जिसके चलते अब तक साथ साथ चुनाव (Election) लड़ने के बावजुद भी महाराष्ट्र में सरकार नहीं बन पा रही है. बीजेपी वेट एंड वॉच की रणनीति पर काम कर रही है तो शिवसेना के तेवर ढीले नहीं हो रहे. उधर शरद पवार (Sharad Pawar) और सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) को ये मौका न निगलते बन रहा है और न ही उगलते.

शिवसेना ने दबाई कमजोर नस
बीजेपी को अपेक्षा के अनुरुप महाराष्ट्र मे सीटें नहीं मिलीं. मौका भांपते ही शिवसेना ने बीजेपी की कमजोर नस दबा दी. मांग लिया मुख्यमंत्री का पद और बड़े मलाईदार मंत्रालय. बीजेपी ने जता दिया कि वो झुकने वाली नहीं और न ही मुख्यमंत्री का पद शिवसेना से बांटने वाली है. शिवसेना लग गई नए रास्ते तलाशने में. जो अब तक नही मिला है. न तो कांग्रेस और न ही एनसीपी लिख कर उन्हे समर्थन देने को तैयार है. महाराष्ट्र के वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओ को सोनिया गांधी ने यही संदेश दिया कि वहां जनमत के साथ कोई एडवेंचर नहीं करें. कांग्रेस की चिंता जायज है. अगर रामजन्म भूमि का फैसला अगले दस दिनों में आता है तो शिवसेना तो जश्न मनाएगी ही ऐसे में जो बचा खुचा वोट बैंक है वो भी हाथ से जाता रहेगा. लेकिन महाराष्ट्र के कांग्रेस नेताओं के दबाव ने आखिरकार इस मुद्दे पर सोनिया और एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार की मुलाकात करवा दी. नतीजा फिर भी कुछ नहीं निकला.

राउत की चल रही बयानबाजी

वहीं, शिवसेना के वरिष्ठ नेता संजय राउत लगातार बयानबाजी कर रहे हैं. मंलगवार को भी उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री शिवसेना का ही बनेगा. महाराष्ट्र की राजनीति और मुखिया के चेहरे में बदलाव होगा, आप देखेंगे. जिसे आप हंगामा कह रहे हैं वह न्याय और अधिकारों की लड़ाई है. जीत हमारी ही होगी.

अमित शाह ने साफ दिया था संकेत
अब शिवसेना ये कह रही है कि मुख्यमंत्री के पद पर तो उन्होने कुछ कहा ही नहीं था. बस उन्होने सरकार में 50 फीसदी हिस्सेदारी मांगी थी. संकेत साफ था कि कुछ बड़े मंत्रालयों को बीजेपी उनके हवाले कर दे तो बात बन जाएगी. हालांकि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने खुद संकेत दिया था कि उपमुख्यमंत्री पद को लेकर उनकी पार्टी शिवसेना की मांग मान सकती है.


इंतजार करो की रणनीति
महाराष्ट्र के कार्यकारी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सोमवार को पूरे दिन दिल्ली में थे. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात की, महाराष्ट्र के प्रभारी महासचिव भूपेन्द्र यादव के साथ घंटों माथापच्ची की और शाम को वरिष्ठ नेता गडकरी के घर भी जा पहुंचे. फिर शाम को ये संदेश देते हुए वापस निकल गए की बीजेपी इंतजार करो और देखो की नीति पर ही काम करती रहेगी और शिवसेना के लिए बातचीत के दरवाजे हमेशा खुले हुए हैं. बीजेपी के पास 121 विधायकों का समर्थन है, जिसमें निर्दलिय और छोटी पार्टियों के विधायक भी शामिल हैं. फिर भी बीजेपी अल्पमत की सरकार नहीं बनाएगी.

दो दिनों में हो सकता है शपथ ग्रहण
सूत्र बताते हैं कि सीएम पद पर तो बातचीत का सवाल ही नहीं उठता और जहां तक बड़े मंत्रालयों का सवाल है, उस पर थोड़ी बहुत बात हो सकती है. बीजेपी को उम्मीद है कि 8 नवंबर तक ये गतिरोध सुलझ जाएगा. उच्च पदस्थ सूत्रों ने ये भी इशारा किया कि दो दिनों के बाद महाराष्ट्र मे सरकार का शपथ ग्रहण हो सकता है.

ये है शिवसेना की मुश्किल
शिवसेना की मुश्किल ये है कि बीजेपी एक स्वाभाविक सहयोगी है और दूसरे दलों के साथ जाकर अपनी राजनीति को एक विपरित दिशा मे ले जाना आत्घाती हो सकता है. एनसीपी और कांग्रेस को भी चिंता अपने वोट बैंक की ही है क्योंकि ओवैसी और प्रकाश अंबेडकर की जोड़ी उनके वोट बैंक में सेंध लगा रही है. बीजेपी के आला नेता पूरे मामले में खामोश रहे और इंतजार करते रहे. वो जानते हैं कि शिवसेना की इस राजनीति का कोई खरीददार नहीं मिलेगा. इसलिए बस वेट एंड वॉच. आगे आगे देखिए होता है क्या.

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