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#HumanStory: नेत्रहीन की दास्तां, 'हमारे सपनों में तस्वीरें नहीं, आवाज होती है

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यशवंत यादव जन्म से देख नहीं सकते. वे कहते हैं- एक किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करना हो तो घंटेभर पहले निकलते हैं. रास्ता साफ-सपाट हुआ तो चालीस-एक मिनट लगेंगे. सड़क जरा ऊबड़-खाबड़ हो तो घंटाभर भी लग सकता है. लोग ताबड़तोड़ गुजरते जाते हैं और आप जैसे थम गए हों. अखरता है. लेकिन यही अकेली तकलीफ नहीं. पढ़ें, यशवंत को.

अक्सर खादी की शर्ट और चुस्त नीली जींस में रहने वाले यशवंत दर्शन पढ़ने वाले छात्र लगते हैं. या फिर करप्शन की जड़ खोद डालने वाला कोई पत्रकार. हॉस्टल से क्लास की ओर धीमे-लंबे डग भरते और पॉश लहजे में बतियाते यशवंत को देखकर तुरंत अंदाजा लगाना मुश्किल है कि वे देख नहीं सकते.

आवाज और छुअन को देखने वाले यशवंत बताते हैं कि आंखें न होना कैसे उन्हें दूसरों से अलग बनाता है.

मैं किसी रिश्तेदारी में गया हुआ था. बारिश का मौसम. गीली मिट्टी की महक से गांवघर सौंधिया रहा था. मर्द खाट पर बैठे बातचीत कर रहे थे. भीतर के कमरों से औरतों की हंसी सुनाई दे रही थी. मैं अधपकी उमर का था. न अधेड़ मर्दों में बैठने लायक, न मूंछें फूटते लड़कों की पांत का.

खूब सोच-समझकर मैं बच्चों के संग खेलने लगा. खेल क्या, मैं कहानी कह रहा था, वे मेरे इर्द-गिर्द घूम रहे थे. तभी एक बच्चे ने एलान किया- मैं टूटे घर में जा रहा हूं. 

मैंने सुना तो बड़ी जोर से डांटा- उधर मत जाओ, सांप काट लेगा. बच्चा रुक गया. साथ में हंसने-बोलने की आवाजें भी एकदम से ठहर गईं. फिर एक जोर की आवाज सुनी. कोई मुझे डांट रहा था कि काट लेगा, कहने की क्या जरूरत थी. कह देता कि वहां मत जाओ, सांप निकलता है. मैं हकबका गया. देर बाद माजरा समझ आया. मैंने बड़ों से अपने 'अंदाजे' के लिए माफी मांगी.

'अंधा' हूं. बचपन से स्पेशल बच्चों के साथ पला-बढ़ा. आंखों-वाले समाज के कायदे नहीं पता. ऐसा कई बार हो जाता है कि मैं जो कहूं, बाकी लोगों को वो खटक जाता है.

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ऐसा कई बार हो जाता है कि मैं जो कहूं, बाकी लोगों को वो खटक जाता है
छोटा था तो बाकी भाई-बहनों के साथ वही खेलता जो घर पर बच्चे खेलते हैं. ठुनककर चलना. हर चीज को छूना. जोरों से पटकना. दो-एक साल बाद भाई-बहन घर से बाहर जाने लगे. खेल के लिए उनके अपने साथी-संगी होते. वे दौड़ने-कूदने लगे. लुका-छिपी खेलने लगे. मैं उनके लिए किसी काम का नहीं था. मैं न तो छिप सकता था और न खोज सकता था. मैं घर पर ही रहा. वही खेल खेलता हुआ, जो पहले हम सारे लोग मिलकर खेला करते.

बनारस के एक छोटे से घर में जन्मा. एक कमरे का घर. वहीं रसोई होती, वहीं खाट-चारपाई. टकराकर धड़-धड़ गिरता. वहीं बिजली के नंगे तार यहां से वहां झूलते होते. इतने पैसे नहीं थे कि फिटिंग करवा सकें.

यशवंत बताते हैं- तब खेल-खेल में कितनी ही बार मैंने बिजली का नंगा तार छू दिया. धड़ाक से झटके के साथ कमरे के दूसरे कोने में पहुंच गया. ऐसे में मां तो घबराहट और चिंता में सिर सहलाती लेकिन पिता भड़क जाते. एक बार कहा- 'अंधे हो तो अंधे जैसे ही रहो. यहां-वहां क्या घूमते फिरते हो.' तब छोटा था लेकिन बात हमेशा के लिए याद रह गई.

22 बरस के यशवंत को बचपन के खेल खूब याद हैं. बड़ा होने लगा तो करंट खाने या गिरकर डांट खाने से बेहतर लगा कि अपने लिए नए खेल ईजाद कर लूं.

छोटे से कमरे में मां-बाप जो भी बात करते, मैं सब सुनता रहता था. एक रोज वो किसी पड़ोसी की बात कर रहे थे. झगड़ालू किस्म का वो पड़ोसी हर बात पर लोगों को धमकी देने लगता. मैंने कल्पना की कि वो पड़ोसी मेरे पास आया है और मुझे भी डरा रहा है. मैं डरने की एक्टिंग करता. खुद ही नए-नए चरित्र तैयार करता और एक्टिंग करने लगता. यही मेरे खेल थे.

आजकल बच्चों को पढ़ाने जा रहा हूं, बीएड की ट्रेनिंग का हिस्सा है

दिल्ली के एक नामी-गिरामी कॉलेज से बीएड कर रहे यशवंत के लिए बनारस से दिल्ली का सफर काफी लंबा था.

हालांकि इस लंबे सफर की थकन उनकी आवाज में नहीं. फोन पार से हंसते हुए बताते हैं- मैं तब नया-नया ही हॉस्टल पहुंचा था. स्पेशल बच्चों का हॉस्टल. घंटियों की गिनती से हमारे सारे काम होते. एक घंटी यानी ये, दो घंटी यानी वो. मुझे तबतक क्रम याद नहीं हुआ था.

एक रोज क्लास जाने की बजाए सो गया. घंटी की आवाज से नींद खुली. धड़ाक से बिस्तर से उठा. स्कूल यूनिफॉर्म पहली और सोचा कि ब्रश आकर कर लूंगा. कमरे से बाहर आया तो बच्चों की लाइन लगी हुई थी. थाल-कटोरियां की आवाज गूंज रही थी. हवा में दाल-चावल की गमक थी. मैं लाइन में लग गया. सोचा कि पहले खाना खा लूं, फिर पूछूंगा कि वक्त क्या हुआ है. पूछा तो जाना- वो रात के खाने की घंटी थी. मैं पूरा दिन सिर्फ सोता रहा था.

कभी रंग न देख पाने की कसक हुई!
बहुत बार. लगभग रोज. हमारे पास अंधेरे-उजाले का कोई कंसेप्ट नहीं. हम आवाजों और एक्टिविटीज से अंदाजा लगाते हैं. शोर हो रहा हो, लोग आ-जा रहे हों, गाड़ियां चल रही हों तो दिन का कोई वक्त है. सन्नाटा छा जाए यानी रात हो चुकी. अब सोना है.

सोने के लिए हम बिना आंखवाले लोग भी बाकियों की तरह आंखें बंद करते हैं. हालांकि हमारी खुली आंखें भी अंधेरा ही देख पाती हैं.

यशवंत जिस कॉलेज में पढ़ते हैं, वहां स्पेशल और 'नॉर्मल' दोनों ही तरह के स्टूडेंट हैं. वे बताते हैं- कई बार छुट्टियों में घूमने की बात चलती है. साथी लोग सैर-सपाटा करते हैं. झरने-वादियां-समंदर देख पाते हैं. हम पहाड़ देख नहीं सकते, न समंदर देख पाएंगे लेकिन छूकर उसे महसूस कर पाते हैं. आसमान छूता पानी, सख्त पत्थर. बस एक ही मलाल है- हम सूरज का उगना या डूबना नहीं देख पाते. कितनी ही बार लोग उन जगहों के किस्से कहते हैं, जहां से उगता या डूबता सूरज बेहद खूबसूरत लगता है.

मैं कभी, कभी देख ही नहीं सकता कि डूबता सूरज मन को क्यों जकड़ लेता है. या फिर उगता सूरज कैसी खुशियां लाता है.

शब्द वो काम कर ही नहीं सकते, जो देखी हुई चीजें कर पाती हैं.

कभी-कभी लगता है कि काश कवि-कहानीकार ऐसे शब्द भी गढ़ सकें कि बिना आंख वाले भी खूबसूरती देख सकें. पूरी बातचीत में निहायत जेंटलमैन रहे यशवंत थोड़ा झुंझलाते हुए ही कहते हैं- शब्द वो काम कर ही नहीं सकते, जो देखी हुई चीजें कर पाती हैं.

उपन्यास पढ़ने का शौक है. कई बार उसमें जगहों का जिक्र रहता है, कभी खाने की लज्जत का बखान. कभी किसी लड़की की खूबसूरती कई पन्नों में बिखरी होती है.

खीझ होती है. लगता है कि किसी तरीके से तो ये सब जान सकूं. जिनकी आंखें हैं, उनकी जिंदगी भी कुछ कम मुश्किल नहीं लेकिन तब भी बिन-आंखों वालों से तो बेहतर ही है.

आजकल बच्चों को पढ़ाने जा रहा हूं. बीएड की ट्रेनिंग का हिस्सा है ये. क्लास में पहुंचता है तो बच्चे खुश हो जाते हैं. इसलिए नहीं कि मैं कूल टीचर हूं. इसलिए कि मैं देख नहीं सकता. वे ऐसी शैतानियां सोचते हैं जो बिना दिखे हो सकें. जैसे किसी को मारना. या बाल खींचना या एक-दूसरे का सामान उठा लेना. बेआवाज मारधाड़ होती है. सुई-पटक सन्नाटे में खेल खेले जाते हैं.

तब क्या गुस्सा आता है!
बिल्कुल नहीं. हंसते हुए यशवंत बताते हैं- वो खुद ही एक-दूसरे की पोल खोल देते हैं. फिर मैं नाम ले-लेकर बात करता हूं और मामला संभल जाता है. बड़ों की देखादेखी बच्चे भी नाम खराब होने से डरते हैं.

(Coordination- डॉ स्वाति सान्याल, दुर्गाबाई देशमुख कॉलेज ऑफ स्पेशल एजुकेशन, दिल्ली)

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