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शारीरिक कमियों के बावजूद ये 7 क्रिकेटर बने दुनिया के महान खिलाड़ी, नं.5 काबिले तारीफ है

क्रिकेट में बगैर फिटनेस बनाए रखे कोई भी क्रिकेटर खेलने के बारे में सोच भी नहीं सकता। पर आपने कभी ऐसा सोचा है कि बिना एक पैर या हाथ के,यानि शारीरिक अक्षमता के वह अपने शानदार प्रदर्शन के दम पर अर्न्तराष्ट्रीय क्रिकेट जगत में अपना नाम कमा सकता है, शायद नहीं। आईये आज हम आपको ऐसे 7 क्रिकेटरों के बारे में बताते हैं,जिन्होंने शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद एक शानदार खिलाड़ी बने,जिसमें भारत के भी कुछ खिलाड़ी शामिल है।

7. भगवत चंद्रशेखर "चंदू" - भारत

दिक्कत: पोलियो
1964 से 1979 के बीच में भारतीय क्रिकेट ने कई जीत और हार देखीं लेकिन ये एक ऐसे व्यक्ति का भी गवाह है जो अपने पोलियो वाले हाथों से बॉलिंग करता था. दाहिने हाथ में पोलियो होने के बावजूद चंद्रशेखर अपनी मारक गेंदबाज़ी के तरीके के लिए जाने जाते थे. उनके इसी नायाब तरीके के लिए उन्हें न सिर्फ साथी खिलाड़ियों की भरपूर तारीफ मिली बल्कि चंद्रशेखर ने भारत को क्रिकेट के मैदान पर कई जीत भी दिलाईं.

6. युवराज सिंह - भारत

दिक्कत: कैंसर

2011 क्रिकेट विश्व कप भारत ने जीता और इस जीत के सबसे बड़े हीरो रहे ऑलराउंडर युवराज सिंह. विश्व कप के प्लेयर ऑफ दी टूर्नामेंट को इस सीरीज के खत्म होते ही जिंदगी का सबसे बड़ा झटका लगा, जब उन्हें पता लगा कि वे कैंसर से पीड़ित हैं. अपनी ऑटोबायोग्राफी में युवराज लिखते हैं, “उस दिन मैं बच्चों की तरह रोया. मैं एक समान्य जिंदगी जीना चाहता था जो अब मुझसे छिन चुकी थी.” हालांकि अमेरिका में कीमोथेरपी से गुजरने के बाद युवराज ने अंंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में फिर वापसी की और साबित कर दिया कि वे एक फाईटर हैं.


5. मार्टिन गुप्टिल - न्यूजीलैंड

दिक्कतः पैर की उंगलियां ना होना

बता दे कि जब 30 सितंबर 1986 को जन्मे मार्टिन महज 13 साल के थे तो फोर्क लिफ्ट (सामान उठाने की लिफ्ट) के नीचे उनका पैर आ गया था, जिसके चलते उनके बाएं पैर की तीन उंगुलियां बुरी तरह से चोटिल हो गई थीं। डॉक्टर्स ने उंगुलियों को बचाने की काफी कोशिश की मगर जान को खतरा देखकर उन्हें मजबूरन काटना ही पड़ा। इसके चलते नन्हे मार्टिन गप्टिल को दौड़ने में भी परेशानी होती। जब वो अपने हालात से टूटते तो परिवार उनका हौसला अफजाई करता और फिर इस कमी को गुप्टिल ने कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने वापसी की, क्रिकेट में जगह बनाई और आज भी सबसे तेज रफ्तार खिलाड़ियों में जाने जाते हैं।

4. शोएब अख्तर - पाकिस्तान

दिक्कत: कोहनी में दिक्कत और सपाट पैर

रावलपिंडी एक्सप्रेस का जिक्र आते ही 100 मील प्रतिघंटे रफ्तार वाली गेंद याद आती हैं. लेकिन उनका शरीर भी किसी अजूबे से कम नहीं. उनकी कोहनी 40 डिग्री तक मुड़ जाती है, जबकि आम तौर पर ये सिर्फ 20 डिग्री मुड़ती है. इसके अलावा उनके पैर सपाट थे और 5 साल की उम्र तक वो सीधे चल भी नहीं सकते थे. लेकिन उन्होंने सारी परेशानियों को दूर करते हुए सबसे तेज गेंदबाज बनकर दिखाया.

3. माइकल क्लार्क - ऑस्ट्रेलिया

दिक्कतः डेसिमेटेड इंटरवर्टेब्राल डिस्क

पूर्व कंगारू कप्तान माइकल क्लार्क का वयस्क जीवन पीठ के दर्द से भरा रहा है. यही वजह है कि उन्हें बार-बार इलाज के लिए क्रिकेट से दूर रहना पड़ता था, कई बार इंजेक्‍शन लेकर खेलना पड़ता था. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. बीमारी को हराते हुए लंबा कामयाब करियर देखा. इसके अलावा उन्हें 2005 में स्किन कैंसर भी हो गया था. लेकिन लगातार टोपी लगाने और जर्सी के नीचे प्रोटेक्टिव गियर पहनकर उन्होंने इससे भी लड़ाई की.

2. जोंटी रोड्स - साउथ अफ्रीका

दिक्कतः मिरगी

दुनिया के सबसे शानदार फील्डर दक्षिण अफ्रीका के जोंटी रोड्स मिरगी से पीडित थे। लेकिन जब भी वह मैदान में खेलते थे तो ऐसा लगता था कोई मशीन मैदान में खेल रही हो। उनकी गेंद रोकने की कला या रनआउट करने की दक्षता का कोई सानी नहीं था। जोंटी रोड्स ने अपने जीवन में मिरगी की बीमारी से ख़ूब लड़ा। मिरगी होने के बावजूद उन्होंने इसे करियर में आड़े नहीं आने दिया और जीत दर्ज की। इन दिनों वो दुनिया भर में अलग-अलग टीमों को फील्डिंग के गुर सिखाते हैं।

1. मंसूर अली खान पटौदी - भारत

दिक्कतः एक आंख की रोशनी जाना

टाइगर पटौदी उम्र जब 11 साल थी तब उनके पिता इफ्तिखार अली खान पटौदी की मौत हो गई थी। इसके बाद मंसूर इंग्लैंड चले गए। वहां रहकर उन्होंने पढ़ाई की और क्रिकेट खेला। वह शुरू से ही जबरदस्त प्लेयर थे। वह मैदान पर खड़े होने के बाद गेंदबाज़ों के पसीने छुड़ा देते। 20 साल की उम्र में इंग्लैंड में घरेलू मैच खेलते थे।लेकिन इंग्लैंड में हुए एक कार एक्सीडेंट ने उनकी पूरी जिंदगी को बदला दिया। एक्सीडेंट इतना भीषण था कि कार का शीशा उनकी दाईं आंख में जा घुसा। एक आंख खराब होने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी के छह महीने बिस्तर पर गुजारे। 

हालांकि, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने हौसले को बरकरार रखा। एक आंख की रोशनी गंवाने के बाद डॉक्टरों ने पटौदी को क्रिकेट खेलने से मना कर दिया था। लेकिन पटौदी इरादे के पक्के थे। उन्होंने एक्सीडेंट के पांच महीने बाद भारत के लिए अपने टेस्ट करियर का आगाज किया। यह मैच 1961 में इंग्लैंड के खिलाफ दिल्ली में खेला गया था। 

बल्लेबाजी करते वक्त पटौदी को दो गेंदें दिखाई देती थीं। मगर उन्होंने जल्द ही इसका भी हल निकाल लिया। उन्होंने फैसला किया वह उस गेंद पर शॉट मारेंगे जो अंदर की तरफ नजर आती है। इतना ही नहीं बल्लेबाजी के दौरान वह अपनी टोपी से दाईं आंख को छुपा लेते थे जिससे उन्हें एक ही गेंद दिखाई दे।