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मुझे दोस्त बनाने में संकोच होता है, जानिए रिश्तों के बारे में मनोवैज्ञानिक तथ्य

सभी रिश्ते व्यक्ति के जन्म के साथ ही बनते हैं। जिस घर-परिवार में हमारा जन्म हुआ है वहां से संबंधित सभी लोगों से हमारा रिश्ता स्वत: ही जुड़ जाता है। इन रिश्तों को तोडऩा या जोडऩा व्यक्ति के हाथों में नहीं रहता है। ये रिश्ते हमेशा ही बने रहते हैं. इन रिश्तों के अतिरक्ति एक रिश्ता है जो हम अपने व्यवहार से बनाते हैं, वह है मित्रता। मित्रता ही एकमात्र ऐसा रिश्ता है जो हम खुद जोड़ते हैं. मित्र हम स्वयं चुनते हैं


चाणक्य के अनुसार यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार का भरण-पोषण सिर्फ आलस्य और झूठे अभिमान की वजह से नहीं करते हैं. हमेशा जो व्यर्थ की बातों में समय नष्ट करते हैं. ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए। इसके अलावा जो लोग अपनी गलती होने पर भी किसी न डरे, विद्वान और वृद्धजन का आदर-सम्मान नहीं करते हैं. उनसे मित्रता नहीं करना चाहिए। जिन लोगों में लज्जा का गुण न हो, जो किसी भी गलत कार्य को करने में संकोच न करें, जो लज्जा हीन हो उनसे मित्रता नहीं करनी चाहिए। जिन लोगों में अन्य लोगों के लिए उदारता का गुण न हो वे भी मित्रता योग्य नहीं होते हैं. दूसरे के दुख पर उपहास करना, किसी की मदद न करने वालों से मित्रता न करें। इसके अलावा जो लोग त्याग की भावना नहीं रखते हो उनसे भी मित्रता नहीं करना चाहिए |

मैं फाइनल ईयर की छात्रा हूं. इंदौर में पली-बढ़ी हूं. आगे की पढ़ाई के लिए मुंबई आई हूं. यहां सब कुछ बहुत एडवांस्ड है. लोग काफ़ी खुले विचारों के हैं. मुझे यहां दोस्त बनाने में भी संकोच होता है. बहुत अकेला महसूस करती हूं. सोचती हूं, वापस इंदौर चली जाऊं. रोमा त्रिपाठी, मुंबई


बदलाव कभी आसान नहीं होता. हमें एक रूटीन जीवन जीने की आदत होती है और उसमें थोड़ा भी बदलाव हमें परेशान कर देता है, पर बदलाव ही संसार का नियम है. जिस चीज़ से हमें डर लगता है या तक़लीफ़ होती है, उससे भागने की बजाय उसका सामना करना उचित है. अपनी सोच बदलें, लोगों और चीज़ों को देखने का नज़रिया बदलें. ख़ुद को भी थोड़ा आत्मविश्‍वासी बनाने का प्रयास करें. लोगों से मिलना-जुलना शुरू करें. धीरे-धीरे संकोच समाप्त हो जाएगा और देखते-देखते आप भी मुंबईकर बन जाएंगी, क्योंकि ये शहर किसी को अजनबी नहीं रहने देता. सबको गले लगाकर अपना बना लेता है, लेकिन थोड़ी कोशिश तो आपको भी करनी होगी. अपनी झिझक दूर करें और यह सोचना बिल्कुल छोड़ दें कि आप किसी छोटे या दूसरे शहर से आई हैं, क्योंकि हर शहर की अपनी ख़ूबियां व ख़ूबसूरती होती है


मैं 35 साल की नौकरीपेशा महिला हूं. कुछ दिनों से अजीब-सी परेशानी में हूं. मेरा मैनेजर मुझे ग़लत तरी़के से परेशान करके, नौकरी छीन लेने की और मुझे बदनाम करने की धमकी दे रहा है. समझ में नहीं आ रहा है, क्या करूं? घर में बताऊं, तो सब नौकरी छोड़कर घर पर बैठने की सलाह देंगे. बबीता शर्मा, पुणे |


आप अकेले ही इस समस्या से नहीं जूझ रहीं, काफ़ी महिलाओं को इन बदतमीज़ियों से गुज़रना पड़ता है. आपको आवाज़ उठानी होगी और हिम्मत करनी होगी. आजकल दफ़्तरों में स्पेशल कमिटी होती है. आप उन पर भरोसा कर सकती हैं और मदद ले सकती हैं, पर भविष्य में दोबारा कोई आपके साथ ऐसा ना करे, उसके लिए सतर्क रहें. अपने कम्यूनिकेशन और पर्सनैलिटी में बदलाव लाएं. कॉन्फिडेंट बनें और पूरी तत्परता से अपने साथ हो रहे अन्याय व शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएं. अपने अन्य सीनियर्स से भी बात करें और यदि सही राह दिखानेवाला न मिले, तो कोई कठोर कदम उठाने से पीछे न हटें. क़ानून का सहारा लें |

मेरी उम्र 32 साल है. मैं पिछले सात सालों से एक लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप में हूं. जब भी शादी की बात करती हूं, वह कोई न कोई बहाना बनाकर मुझे समझा लेते हैं. घरवाले शादी के लिए दबाव डाल रहे हैं, पर मैं किसी और से शादी करने की सोच भी नहीं सकती. क्या करूं? नेहा सिंह, प्रयागराज
आप कब तक इस तरह समय गंवाएंगी? घरवालों की चिंता स्वाभाविक है. आपको अपने प्रेमी से साफ़-साफ़ बात करनी होगी और एक अल्टीमेटम देना होगा. कहीं ऐसा न हो कि वो आपके भरोसे का फ़ायदा उठा रहा हो, इसलिए अपने बारे में गंभीरता से सोचना शुरू कर दें. ख़ुद पर विश्‍वास रखें. आपका जीवन और आपका भविष्य बहुत महत्वपूर्ण और क़ीमती है, किसी भी तरह से उससे समझौता करना नादानी होगी. समय रहते सही फैसला लें

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