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क्या वास्तव में सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु हवाई दुर्घटना में हुई थी, जानकार चौक जाएंगे

आप सभी लोगों का तह दिल से हमारे चैनल पर स्वागत है। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी के सहयोगी अब्बास अली। प्लेन क्रैश में मौत की खबर के बाद नेताजी से मैं मिला'।


नेताजी सुभाष चंद्र बोस की फौज में कैप्टन रहे अब्बास अली अपनी आखिरी सांस तक यही दावा करते रहे कि नेताजी की मौत फारमोसा के प्लेन क्रैश में नहीं हुई। पढ़िए अब्बास अली का इस बारे में क्या कहना था। यह सब तो जानबूझ कर कही गई बाते हैं। मैं यह बात कैसे मान लूं जबकि इस घटना के एक हफ्ते बाद सिंगापुर के मैस में मैंने उनके साथ खाना खाया और उनका जोशीला भाषण सुना। मेरी इन आंखों ने नेताजी को बोलते अपने साथ हाथ मिलाते देखा है। मैं उनकी मौत की बात पर कैसे यकीन कर लूं? वह कहते थे कि नेताजी का राज तो रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) में उनकी फाइलों में दफन है। इसके अलावा अब्बास अली कहते थे कि आजादी के बाद क्या हमारी मुश्किलें (आजाद हिंद फौज के सैनिकों की) कम हो गईं? हमारे साथ उस समय की कांग्रेस सरकार ने भेदभाव किया।



भारतीय फौज में हमारा विलय करने की बात पर कहा गया कि नहीं यह फौज भारतीय फौज में शामिल नहीं हो सकती। इसी तरह आजादी के कई दशकों तक हमें स्वतंत्रता सेनानियों का दर्जा ही नहीं दिया गया। बाद में हमें हमारा हक मिला। सरकार से उपेक्षा मिलना हमारे लिए कोई नई बात नहीं है। मैं जब मुल्तान के किले में कैद था और मुझे फांसी की सजा सुनाई गई तो अंग्रेज अफसर ने पूछा ‘कैप्टन अंग्रेज हुकूमत से बगावत का अंजाम जानते हो’ मैंने कहा ‘हां जानता हूं, मौत और यह भी जानता हूं कि अगर हिटलर ने इंग्लिश चैनल पार कर लिया होता तो तुम (ब्रिटेन के लोग) हिटलर के गुलाम होते’।



कुछ दिनों बाद नेहरू-माउंटवेटन में समझौता होने के बाद जब मैं मुल्तान के किले से रिहा हुआ तो वहां के रेलवे स्टेशन तक मेरा ऐसा स्वागत हुआ कि गले की मालाओं ने आंखों तक को ढक लिया। लेकिन जब मैं वाया दिल्ली अपने गांव (बुलंदशहर के कलंदरगढ़ी) जाने के लिए खुर्जा रेलवे स्टेशन उतरा तो गांव के ही तांगे वाले ने मुझे नहीं पहचाना। यहां पर तो बंटवारे के बाद अफरा-तफरी मची हुई थी। उसी वक्त अंदाजा हो गया था कि आजादी के बाद देश के निर्माण के लिए एक और संघर्ष यात्रा शुरू करनी है। यह यात्रा कैप्टन अब्बास अली की आखिरी सांस तक जारी रही।

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