इतिहास में जन्मा एक ऐसा योद्धा जिसने अंग्रेजों को भगाने के लिए मुगल और मराठों से दोस्ती की - AcchiNews.com अच्छी न्यूज़ डॉट कॉम

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इतिहास में जन्मा एक ऐसा योद्धा जिसने अंग्रेजों को भगाने के लिए मुगल और मराठों से दोस्ती की

वीर योद्धाओं में से एक है “टीपू सुल्तान” जिन्हें फर्स्ट मिसाइल मैन ऑफ द वर्ल्ड भी कहा जाता है तो चलिए आज हम इस वीर योद्धा के बारे में कुछ ऐसी बातें जानने की कोशिश करते हैं जो शायद आप नहीं जानते, तो चलिए जानते हैं


मैसूर का शेर कहे जाने वाली टीपू सुल्तान का जन्म 10 नवंबर 1750 में कर्नाटक के देवनहल्ली में हुआ था टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली ने बचपन में ही टीपू को शूटिंग, घुड़सवारी और तलवारबाजी सिखाई थी और इसी के साथ ही उनको पर्शियन, उर्दू और कई दूसरी भाषाएं सिखाई गई थी 1766 में 17 साल की उम्र में ही टीपू ने अपने पिता के साथ युद्ध लड़ा था 1782 में टीपू के पिता हैदर अली की बीमारी की वजह से मौत हो गई 22 साल के टीपू सुल्तान पर जिम्मेदारी कंधों पर थी उन्होंने इस इंडिया कंपनी के खिलाफ कड़ी जमशेदजी अंग्रेजों को भगाने के लिए टीपू ने मुगल और मराठों से हाथ मिलाया और इसी वजह से 1784 में सेकंड एंगलो मैसूर लड़ाई खत्म हुआ और यही नहीं अंग्रेज उनसे ट्रीटी यानी कुछ करार भी करने के लिए राजी हो गए और फिर अंग्रेजों और टीपू के बेंगलुरु साइन की गई जिसमें टीपू ने रखी हर सर्च अंग्रेजों ने मान ली थी। 


अंग्रेजो के खिलाफ जीतने के बाद भी जैसे टीपू के मन की आग अभी तक शांत नहीं हुई थी इसके बाद टीपू ने त्रवंकोर पर आक्रमण करने की तैयारी शुरू की लेकिन प्रीति ऑफ मैंगलोर के अनुसार त्रवंकोर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का एक सहयोग था लेकिन फिर भी सितंबर 1769 टीपू सुल्तान ने आक्रमण कर दिया और फिर शुरू हुआ था अंग्रेजों ने अपनी विशाल सेना के साथ टीपू की सेना पर आक्रमण कर दिया टीपू ने जल्दी हार नहीं माना लेकिन अंग्रेजों के विशाल सेना के सामने टीपू कमजोर पड़ गए 1782 में युद्ध को खत्म करने के लिए एक और करारा मीटिंग ऑफ श्रीरंगपट्टनम साइन किया गया जिसके अनुसार टीपू सुल्तान को अपने कई राज्यों को खोना पड़ा था इसके बाद ब्रिटिश ने यह जान लिया था कि टीपू सुल्तान के हमारे लिए एक बड़ा खतरा है फिर 1799 में ब्रिटिश ने मैसूर पर हमला कर दिया ब्रिटिश सेना में 50,000 से ज्यादा सैनिक थे लेकिन टीपू सुल्तान के पास केवल 30000 सैनिक थे अंग्रेजों ने रंग पटनम पर कब्जा कर दिया और टीपू टीपू के कुछ दोस्तों ने टीपू को यह सलाह दी कि वह गुप्त सुरंग से अपनी जान बचाकर भाग जाए लेकिन युद्ध के मैदान से भाग जाए वह शहर कैसा बड़ी वीरता से टीपू जंग में कूद पड़े और 4 मई 1799 को उन्हें वीरगति प्राप्त हुई।

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