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फांसी की सजा पाने वाले कैदियों को जेल में क्या खास सुविधाएं मिलती हैं

दरअसल, फांसी की सजा पाने वाले कैदियों को जब जेल में लाया जाता हैं, जहां उनको कुछ खास सुविधाएं मिलती हैं. देश का Model Prison Manual (कारागार नियमावली) के अनुसार, जेल के सामान्य कैदियों और फांसी के लिए आने वाले कैदियों में अंतर होता है. इस नियमवाली का पालन करते हुए जेल प्रशासन इन कैदियों को उसी तरीके से ट्रीट करते हुए अतिरिक्त सुविधाएं मुहैया कराता है.

फांसी के कैदी जब जेल में लाए जाते हैं तो उनको कुछ खास सुविधाएं मिलती हैं, जो सामान्य कैदियों, को नहीं मिलतीं। यहां तक कि सरकार की तरफ से उन्हें हर महीने खर्च की भी एक तय रकम देने की अनुमति होती है कि वो जेल कैंटीन से चाय पी सकें।

देश का मॉडल प्रिजन मैन्युअल, यानि कारागार नियमावली कहती है कि जेल में सामान्य कैदियों, और फांसी के लिए आने वाले कैदियों, में अंतर होता है। लिहाजा, जेल प्रशासन उन्हें उसी तरीके से ट्रीट भी करता है और सुविधाएं भी देता है। फांसी की सजा पाए कैदियों, को सामान्य कैदियों, से अलग ऐसी सेल दी जाती है, जिसमें वो अलग रहते हैं। वैसे तो प्रावधान ये है कि हर फांसी के कैदी को अलग सेल दी जाए लेकिन अगर मृत्युदंड की सजा पाने वाले कैदी अधिक हैं तो चार कैदियों, एक साथ एक कक्ष या दो कक्षों में रखा जा सकता है।

हर चार ऐसे कैदियों, पर एक गार्ड तैनात होता है। इन कैदियों, को रोजाना, उप जेल अथीक्षक देखने आता है, ताकि वो उनकी स्थिति का मुआयना करता रहे।

फांसी की सजा पाए कैदियों को सुबह और शाम खुले में एक घंटे एक्सरसाइज, करने की सुविधा मिलती है। ये एक्सरसाइज, सुरक्षा के बीच होती है। हालांकि कैदी अपनी एक्सरसाइज के समय को बढ़ा सकते हैं बशर्ते मेडिकल अफसर की रिपोर्ट में उन्हें इसकी अनुमति मिले।

अगर ये कैदी कभी बीमार पड़ते हैं तो उन्हें अस्पताल तक ले जाने के लिए खास परमिशन, लेनी होती है जो इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस देता है लेकिन इससे पहले मेडिकल अफसर और जेल अधीक्षक को इस बारे में अपनी रिपोर्ट भेजनी होती है। अगर उसे अस्पताल में भर्ती करने की नौबत आती है तो उसे सामान्य कैदियों, से अलग रखा जाता है। उसकी सुरक्षा के लिए अलग से एक गार्ड तैनात रहता है।

इसके अलावा फांसी की सजा पाए कैदियों, को जेल अधीक्षक की अनुमति से धार्मिक किताबें, धार्मिक चित्र और धार्मिक प्रतीक चिन्ह रखने की अनुमति मिल जाती है। हालांकि धार्मिक प्रतीक चिन्ह की अनुमति देते हुए सुरक्षा मानकों का भी ध्यान रखा जाता है। बता दें कि 26/11 हमले में पकड़े गए जिंदा आतंकवादी अजमल कसाब ने भी जेल में रहने के दौरान उर्दू अख़बार पढ़ने की मांग की थी जिसे जेल प्रशासन की तरफ से पूरा किया गया था.

अगर मृत्युदंड की सजा पाए, कैदी चाहें तो उन्हें रोजाना, उनके सेल में अखबार और पत्रिकाएं, किताबें भी उपलब्ध कराई जाती हैं। अगर कुछ लिखना चाहे तो उसे सरकार के खर्च पर ही स्टेशनरी, मिलती है।

अगर कोई कैदी ऐसा हो, जिसके पास अपना कोई प्राइवेट कैश नहीं हो तो जेल अधीक्षक उसके लिए हर महीने एक मुश्त रकम बांध देता है, जो उसे सरकार की ओर से मिलती है. उसमें वो जेल कैंटीन से चाय पी सकता है या कुछ रिफ्रेशमेंट ले सकता है.

इसके अलावा फांसी देने से पहले इस कैदियों की आखिरी इच्छा पूछी जाती है. जिसमें परिवार वालों से मिलना, अच्छा खाना जैसी कई अन्य ख़्वाहिशें भी पूरी की जाती हैं.