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गर्व का नाम डिक्शनरी में बदलकर 'शोक' कर देना देना चाहिए: कृष्ण कांत

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कृष्ण कांत
कई विकलांग और बीमार लोग पैदल ही दिल्ली-मुुुंबई से चले और अपने घर पहुंंच गए. उसी दिल्ली-मुंबई से ट्रेनें चली और कहीं और पहुंच गईं. जिस ट्रेन को यूपी जाना था, ओडिशा चली गई. देश ही नहीं, दुनिया के इतिहास में पहली बार हुआ है कि 40 ट्रेनें रास्ता भटक गईं.

लेकिन ट्विटर देवता का आदेश है कि इस पर भी गर्व करना है. गर्व का नाम डिक्शनरी में बदलकर 'शोक' कर देना देना चाहिए. जिस पर गर्व करने को कहा जाए, समझ लीजिए कि शोक मनाने का मुफीद मौका है. इस रास्ता भटकने पर भी रेलमंत्री और सरकार रेलवे के कसीदे पढ़ रहे हैं. रेलवे की महान उपलब्धि यह है कि चलती है बंबई के लिए, पहुंच जाती है बेंगलुरु. चलती है गोंडा के लिए, पहुंच जाती है गाजियाबाद.

जो रेलवे रोज छह हजार ट्रेन चलाती थी, उससे 200 ट्रेनें नहीं चल पा रही हैं. जो रेलवे रोज आस्ट्रेलिया के बराबर जनता को ढोती थी, वह दो महीने में 37 लाख लोगों को यात्रा करवा कर अपनी पीठ ठोंक रही है.

इस महान काहिली और असफलता के लिए भारतीय रेलवे और रेलमंत्री को महा भारत रत्न दे देना चाहिए.

भूखे-प्यासे मजदूरों को 90-90 घंटे तक ट्रेन में यातना देने के लिए राहुल गांधी को इस्तीफा दे देना चाहिए और नेहरू को हमेशा के लिए राजनीति से त्यागपत्र दे देना चाहिए. पहली और अंतिम मांग यही है जिसके लिए आप मुंह खोल सकते हैं.

महाराष्ट्र से गोरखपुर के लिए चली ट्रेन ओडिशा पहुंच गई। बेंगलुरु से बस्ती जाने वाली ट्रेन गाजियाबाद पहुंच गई. महाराष्ट्र से ट्रेन पटना के लिए चली, लेकिन पहुंच गई पुरुलिया.

रेलवे का कहना है कि इन ट्रेनों का रास्ता बदला गया है. अगर यह जानबूझकर किया गया है तो सलाम कीजिए.
(ये लेखक के निजि विचार हैं)